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गुरुवार, 4 मार्च 2010

गुरूसहाय भटनागर “बदनाम” की एक गजल - प्रस्तुति- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”


स्मानी शायर गुरूसहाय भटनागर ‘‘बदनाम’’



दर्द के वर्क पर


दर्द के वर्क पर गीत हमने लिखे,



रोज़ ही हम उन्हें गुनगुनाते रहे।


गाहे आबादियाँ गाहे बीरानियाँ,


उनसे मिलने की यादें सजाते रहे।


नाम लिख-लिख के उनका हर रोज ही,


अपने दिल में उन्हें हम बसाते रहे।


उनकी खुश्यिों की खातिर कहाँ से कहाँ,


मंजिलों में भी महफिल सजाते रहे।


चल दिये छोड़ कर साथ कुछ इस तरह,


जिन्दगी भर हमें याद आते रहे।


बन के ‘बदनाम’ ओढ़ी है रूसवाइयाँ,


वो हमें हम उन्हें याद आते रहे।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. भटनागर जी की यह अच्छी गज़ल है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. भटनागर जी की ये ग़ज़ल बहुत बढ़िया लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  3. शास्त्रीजी,
    बदनामजी तक मेरी बधाईयाँ पहुंचा दें ! वे बदनाम नहीं, नेकनाम भी होते तो भी उनकी गज़लें क़द्र से पढ़ी और सराही जातीं ! उन्होंने दिल की जुबां से ग़ज़ल कही है; और पढ़नेवाले इसे दिल से ही पढेंगे !!
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं

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