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सोमवार, 22 मार्च 2010

“देश-भक्ति गीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज प्रस्तुत कर रहा हूँ
अपना एक पुराना देश-भक्ति गीत!
जिसको अपना मधुर स्वर दिया है
मेरी जीवनसंगिनी "श्रीमती अमर भारती" ने

 

मेरे प्यारे वतन, जग से न्यारे वतन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।


अपने पावों को रुकने न दूँगा कहीं,
मैं तिरंगे को झुकने न दूँगा कहीं,
तुझपे कुर्बान कर दूँगा मैं जानो तन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

जन्म पाया यहाँ, अन्न खाया यहाँ,
सुर सजाया यहाँ, गीत गाया यहाँ,

नेक-नीयत से जल से किया आचमन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।


तेरी गोदी में पल कर बड़ा मैं हुआ,
तेरी माटी में चल कर खड़ा मैं हुआ,
मैं तो इक फूल हूँ तू है मेरा चमन।

मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

स्वप्न स्वाधीनता का सजाये हुए,
लाखों बलिदान माता के जाये हुए,
कोटि-कोटि हैं उनको हमारे नमन।
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई इस बढ़िया प्रस्तुति के लिए , शास्त्री जी

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  2. बहुत बढ़िया ! शानदार !बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल की गहराई से निकला देशप्रेम गीत...बहुत बढ़िया ...बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत प्यारा ओर शानदार जी.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छी रचना ! शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्रीजी,
    यह देश-गीत पढ़कर मुदित हुआ ! सच है, इस शरीर का ज़र्रा-ज़र्रा वतन की मिटटी का ऋणी है !
    आपकी लेखनी और देश की माटी को मेरा सलाम !
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस बढ़िया प्रस्तुति के लिए बधाई शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं

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