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बुधवार, 24 मार्च 2010

“एक मुक्तक” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जल रहा स्वेद है चरागों में,
पल रहा भेद है समाजों में!
सूखती जा रही सजल सरिता,
खल रहा छेद है रिवाजों में!

10 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया मुत्तक शास्त्री जी,

    व्यभिचारी आचार बन गया ,
    दरार आ गई आगाजो में !
    वाल्मिकी रामायण लिख रहे,
    फर्क आ गया अंदाजो में !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये मुक्तक तो मोती के समान है जो गहरे सागर से निकला हो...सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. हम सोचते रहे...सोचते रहे...सोचते रहे..पढकर.......
    ....
    यह पोस्ट केवल सफल ब्लॉगर ही पढ़ें...नए ब्लॉगर को यह धरोहर बाद में काम आएगा...
    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_25.html
    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

    उत्तर देंहटाएं
  4. कमाल का मुक्तक शास्त्री जी ... बहुत दिनो बाहर रहा तो आपको नियमित नही पढ़ पाया ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और सार्थक मुक्तक. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर मुक्तक
    सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह …………………बहुत ही सुन्दर मुक्तक्………………काफ़ी गूढ बात कह दी चंद पंक्तियो मे ही।

    उत्तर देंहटाएं
  8. खल रहा छेद है रिवाजों में!
    बहुत सुन्दर भाव, कम शब्दों में दिल को छू लेने की कला कोई आपसे सीखे
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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