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शनिवार, 6 मार्च 2010

“रूमानी शायर "बदनाम" की एक ग़ज़ल” (प्रस्तुतिःडॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

वस्ल की शाम
महकी महकी सी है वादियों की सवा
शौक से आके इस का मज़ा लीजिऐ
बन गयी मैं गज़ल आप के सामने
जैसे चाहो मुझे आजमा लीजिऐ
मय को पी कर अगर दिल मचलने लगे
अपना दिल हमें फिर बना लीजिऐ
ये बहारों का रंग हुस्न की तश्नगी
प्यास नजरों की अपनी बुझा लीजिऐ
मैं बयाबां में हूँ खुशनुमा एक कली
मुझको जैसे जहाँ हो सजा लीजिऐ
कल तलक आरजूयें जो ‘बदनाम’ थीं
वस्ल को शाम है दिल लुटा लीजिऐ


वादियों-जंगल, कानन, वस्ल-मिलन, मुलाकात, सवा-हवा,
मय, शराब तश्नगी-प्यास, बयाबां-जंगल, आरजूयें-इच्छायें

गुरूसहाय भटनागर “बदनाम”

11 टिप्‍पणियां:

  1. गुरुसहाय भटनागर जी को इस रचना के लिये बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. typing errors हटा दें तो और अच्छी लगेगी ये....

    उत्तर देंहटाएं
  3. ग़ज़ल का आनंद बिलकुल निराला है पढने में इसका आनंद मुक्तक से कई गुना जादा है ,

    उत्तर देंहटाएं
  4. ग़ज़ल का आनंद बिलकुल निराला है पढने में इसका आनंद मुक्तक से कई गुना जादा है ,

    उत्तर देंहटाएं

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