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मंगलवार, 23 मार्च 2010

“कंचन का बिछौना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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 रूप धरती ने धरा कितना सलोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,
शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,
छा गया चारों तरफ सोना ही सोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

रश्मियों ने रूप कुन्दन का सँवारा,
नयन को सबके लुभाता यह नज़ारा,
धान्य से सज्जित हुआ हरेक कोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

मस्त होकर गा रहा लोरी पवन है,
नाचता होकर मुदित जन-गण मगन है,
मिल गया उपहार में स्वर्णिम खिलौना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. आह ... "कंचन का बिछोना" ..कितना सुन्दर शब्द संयोजन है

    उत्तर देंहटाएं
  2. भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,
    शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,
    सजा चारों तरफ सोना ही सोना।
    बिछा गया खेतों में कंचन का बिछौना।।
    वाह वाह्……अत्यन्त सुन्दर…………………बहुत ही मनमोहक्।

    उत्तर देंहटाएं
  3. रश्मियों ने रूप कुन्दन का सँवारा,
    रोशनी में चन्द्र की निखरा नज़ारा,
    धान्य से सज्जित हुआ हरेक कोना।
    बिछा गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

    श्रधेय,
    बहुत ही सुन्दर रचना...
    मन मुदित हुआ पढ़ कर...

    उत्तर देंहटाएं
  4. रूप धरती ने धरा कितना सलोना।
    बिछा रहा खेतों में कंचन का बिछौना।।
    बहुत मनभावन रचना. प्रकृति के बदलते स्वरूप पर पैनी नजर
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  5. भारतीय नागरिक23 मार्च 2010 को 5:25 pm

    श्रीमान जी, आपने सुनहरे गेंहू की लम्बी लम्बी बालियों का बहुत अच्छा वर्णन किया है. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  6. भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,
    शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,
    सजा चारों तरफ सोना ही सोना।
    बिछा गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

    बहुत सुन्दर शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर रचना....कंचन के बिछौने के रूप में लहलहाती फसलों का बहुत सुन्दर वर्णन

    उत्तर देंहटाएं
  8. रश्मियों ने रूप कुन्दन का सँवारा,
    रोशनी में चन्द्र की निखरा नज़ारा,
    धान्य से सज्जित हुआ हरेक कोना।
    बिछा गया खेतों में कंचन का बिछौना।।
    चन्द्र की निखरा
    ज़रा इसे ठीक कर लें।
    आपकी यह रचना विषय को कलात्‍मक ढंग से प्रस्तुत करती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. किसान ने सारी धरती पर सोना बिछा दिया... वाह बहुत सुंदर कविता लगी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूबसूरत और मनमोहक रचना लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति !आपकी कविता देख - पढ़ कर बाबा नागार्जुन की 'सोनिया समन्दर' कविता की स्मृति हो आई :

    सोनिया समन्दर
    सामने
    लहराता है
    जहाँ तक नज़र जाती है,
    सोनिया समन्दर !

    बिछा है मैदान में
    सोन ही सोना
    सोना ही सोना
    सोना ही सोना

    गेहूँ की पकी फसलें तैयार हैं--
    बुला रही हैं
    खेतिहरों को
    ..."ले चलो हमें
    खलिहान में--
    घर की लक्ष्मी के
    हवाले करो
    ले चलो यहाँ से"

    बुला रही हैं
    गेहूँ की तैयार फसलें
    अपने-अपने कॄषकों को...

    उत्तर देंहटाएं

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