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शुक्रवार, 5 मार्च 2010

‘‘देवदत्त प्रसून का एक गीत’’ प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

छल की गागर छलकी रे।


छल की गागर छलकी रे।
हवा चली जहरीली,

हलकी-हलकी रे।।

कपट हाथ से विनाश ढपली,

बजा रही है तृणा पगली,

मिटा ‘आज’ को चिन्ता करती,

देखो कितनी ‘कलकी’ रे।

छल की गागर छलकी रे।।

अरे ततैया सुन्दर लगती,

नस में डसे तो आग सुलगती,

धोखा नजर न खाये देखो,

खबर रखो पल-पल की रे।

छल की गागर छलकी रे।।

उर के सारे भाव खोल कर,

मन के मोती सब टटोल कर,

भेद खोलतीं चुपके-चुपके,

नैन से बून्दें ढलकीं रे।

छल की गागर छलकी रे।।

‘रात’ रोशनी निगल चुकी है,

लिए कालिमा निकल चुकी है,

इन जलते-बुझते तारों की,

चमक दिखाती झलकी रे।

छल की गागर छलकी रे।।




देवदत्त “प्रसून”

8 टिप्‍पणियां:

  1. पाप की गगरी की भाँति छल की गगरी के बिम्ब मे यह अद्भुत गीत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. उर के सारे भाव खोल कर,
    मन के मोती सब टटोल कर,
    भेद खोलतीं चुपके-चुपके,
    नैन से बून्दें ढलकीं रे।
    छल की गागर छलकी रे।।

    Ati Sundar !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 06.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. समसामयिक रचना....सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहतरीन ओर लाजवाब कविता, देवदत्त प्रसून ओर आप का धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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