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बुधवार, 17 मार्च 2010

“स्लेट और तख़्ती” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सिसक-सिसक कर स्लेट जी रही,
तख्ती ने दम तोड़ दिया है।
सुन्दर लेख-सुलेख नहीं है,
कलम टाट का छोड़ दिया है।।
slate00patti1  IMG_1104 
दादी कहती एक कहानी,
बीत गई सभ्यता पुरानी,
लकड़ी की पाटी होती थी,
बची न उसकी कोई निशानी।।

फाउण्टेन-पेन गायब हैं,
जेल पेन फल-फूल रहे हैं।
रीत पुरानी भूल रहे हैं,
नवयुग में सब झूल रहे हैं।।

समीकरण सब बदल गये हैं,
शिक्षा का पिट गया दिवाला।
बिगड़ गये परिवेश प्रीत के,
बिखर गई है मंजुल माला।।

23 comments:

वन्दना 17 मार्च 2010 11:03 am  

bahut sundar baal geet ..........aaj to slate ka riwaaz bhi khatam hone ke kagaar par hai.

sangeeta swarup 17 मार्च 2010 11:31 am  

तख्ती और स्लेट कि खूब याद दिलाई है...और सच ही सारी परिपाटी बदल गयी है...सुन्दर अभिव्यक्ति

ताऊ रामपुरिया 17 मार्च 2010 11:35 am  

बचपन याद दिला दिया आपने. बहुत सुंदर कविता.

रामराम.

पी.सी.गोदियाल 17 मार्च 2010 11:54 am  

सिसक-सिसक कर स्लेट जी रही,
तख्ती ने दम तोड़ दिया है।
सुन्दर लेख-सुलेख नहीं है,
कलम टाट का छोड़ दिया है।।

BAHUT SUNDAR PANKTIYAA SHASHTREE JI

rashmi ravija 17 मार्च 2010 12:21 pm  

बहुत बढ़िया कविता...बचपन की याद दिलाती हुई.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen 17 मार्च 2010 12:22 pm  

अरे वाह, बहुत सुन्दर, बहुत खूबसूरत कविता.

Babli 17 मार्च 2010 2:30 pm  

तख्ती और स्लेट..ये दोनों शब्द तो हमें बचपन की याद दिला दी! बहुत ख़ूबसूरत रचना!

नीरज मुसाफिर जाट 17 मार्च 2010 2:31 pm  

मुझे गर्व है कि मै भी कभी तख्ती व स्लेट पर लिखा करता था।

shikha varshney 17 मार्च 2010 3:05 pm  

तख्ती और स्लेट कि खूब याद दिलाई है...और सच ही सारी परिपाटी बदल गयी है...सुन्दर अभिव्यक्ति

Prem Farrukhabadi 17 मार्च 2010 3:26 pm  

समीकरण सब बदल गये हैं,
शिक्षा का पिट गया दिवाला।
बिगड़ गये परिवेश प्रीत के,
बिखर गई है मंजुल माला।।

बचपन की याद .सुंदर कविता.

Parul 17 मार्च 2010 4:43 pm  

sundar baal geet :)

Dr. Smt. ajit gupta 17 मार्च 2010 5:09 pm  

अब नयी प्रकार की स्‍लेट आ गयी है, जिसमें लिखो और खूब लिखो। सब कुछ अपने आप मिट जाता है। अपने लिए तो यह कम्‍प्‍यूटर है ना? बढिया बाल कविता।

Udan Tashtari 17 मार्च 2010 5:34 pm  

याद आये पुराने दिन..समय बदल गया है.

Suman 17 मार्च 2010 5:39 pm  

nice

M VERMA 17 मार्च 2010 5:48 pm  

लकड़ी की पाटी होती थी,
बची न उसकी कोई निशानी।।
यादों में ही बची है अब तो लकड़ी की पाटी
बहुत सुन्दर

रावेंद्रकुमार रवि 17 मार्च 2010 7:02 pm  

स्लेट और तख़्ती पर लिखने के दिन
याद दिला दिए इस कविता ने!

मनोज कुमार 17 मार्च 2010 7:34 pm  

बहुत अच्छी कविता।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" 17 मार्च 2010 7:46 pm  

bahut hee achha baal geet guru ji.

Tarkeshwar Giri 17 मार्च 2010 10:14 pm  

wo bhi ek din tha , jab adha samay takti ko kisane main hi lag jata tha.

डॉ० डंडा लखनवी 18 मार्च 2010 4:04 am  

शोभनम् ! बहुत सुनदर .........हर चरण निराला है.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 मार्च 2010 6:21 am  

@Dr. Smt. ajit gupta ji!

नई तरह की स्लेट तो आ गई है परन्तु
हस्तलेख तोलगातार बिगड़ रहे हैं!
अब तो सुलेख पर आयोजित
पुरस्कारों की गूँज कम ही सुनाई देती हैं!

anand jagani 18 मार्च 2010 8:26 pm  

sanskar ki tarah slate bhi apna roop badal rahi hain.aab likho mat bus paste karo.bahut sunder kavita.
main hindi main kese likkhu.tarkeeb batayo.

Mired Mirage 19 मार्च 2010 1:30 am  

मेरी रसोई में तो आज भी स्लेट टंगी हुई है। भूलने की आदत है, इस स्लेट का बहुत सहारा है।
घुघूती बासूती

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