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रविवार, 21 मार्च 2010

“दो हल्की-फुल्की परिभाषाएँ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कृतज्ञ

जिसके मन में
चलता रहता है
यज्ञ 
दुनियादारी
निभाने में
होता है
सुविज्ञ
 
जो धन से
भले ही हो
कंगाल
लेकिन
उसका हृदय
होता है
बहुत विशाल
 


कृतघ्न

गोबर से भी
गया गुजरा
लगता है
कोठे का मुजरा 

ऊपर से कोमल
भीतर से कठोर
खोजता प्रतिदिन
नये-नये ठौर

उजला तन
काला मन
वही तो होता है
कृतघ्न!

12 टिप्‍पणियां:

  1. परिभाषाएँ हल्की-फुल्की नहीं है.
    सटीक हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. जो धन से
    भले ही हो
    कंगाल
    लेकिन
    उसका हृदय
    होता है
    बहुत विशाल
    bahut anoyhi baat kahi hai aapne. Badhai!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत गहन परिभाषाएं हैं....अच्छी सीख के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. अजी यह हल्की कहा, बहुत गहरी ओर भाव पुर्ण बाते कह रही है.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी परिभाषायें !
    छोटि किन्तु मारक !

    उत्तर देंहटाएं
  6. सटीक!

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  7. सनझाने का यह तरीक़ा
    बहुत उत्तम है!
    --
    ज़ारी रखिए!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सटीक परिभाषाएँ हैं.

    बधाई!

    -

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं

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