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गुरुवार, 18 मार्च 2010

“होली के हुड़दंग में:मदन विरक्त” (प्रस्तुति-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

होली के हुड़दंग में
घोटी गई भंग में
पीकर जब नाचता है
भ्रष्ट आदमी
तब लगता है
बन गया हो बाप
अपने बाप का
उससमय आती है याद
परदेशी समाज की
चोरी-छिपे राज की
भ्रष्टाचारी साज की
जो कि बजाया जाता है
सतरंगी दुनिया में
कल्पना कर
सुनहरी दुनिया की
सच्चे देशभक्त की
लगाकर रोज मोर्चा
केशर की क्यारी में
विषधर पाले जाते हैं
केशर नही उगाई जाती
पत्थर से घायल कर
इंसान में इंसानियत
नही जगाई जाती
भयभीत आत्मविश्वास
यही कहता है
मुझे चाहिए
रहने को मकान
खाने को रोटी
पहनने को कपड़ा
किन्तु
कुछ भी तो नही
नसीब में
वह पीता है रक्त
किसी “विरक्त” का
नह मदन होकर भी
विरक्त है
जो जहर पीकर
जिन्दगी जीता है
किन्तु
इसका जीवन
बाइबिल, कुरान, गीता है
यह मौत के
जर्जर जीवन को
अपने आदर्शों से
जीवनभर सीता है!
जीवनभर सीता है!!
IMG_0903
(मदन “विरक्त”)

4 टिप्‍पणियां:

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