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मंगलवार, 9 मार्च 2010

"मेरा मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जाने कितने चेहरों का दिग्दर्शन मैंने पाया!    
किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!     


तुमको देखा है मैंने केवल मन की आँखों से  
इसीलिए अपने मन को अन्यत्र नहीं भटकाया!   
किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!    


चितवन तो बाँकी थी पर लावण्य नही था उनमें, 
सीधी-सादी अमराई ने ही मुझको ललचाया!  
किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!   


बरसाती नालों में देखी ओछी खनक-चपलता ,  
पर गंगा की गहन धार का रूप मझे ही भाया!
 किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!  


जग के उपवन में चहकी थीं रंग-विरंगी कलियाँ,  
मगर रात की रानी ने ही मेरा मन महकाया!  
किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!   


जाने कितनी सजी-धजी तितलियाँ घूमती वन में,  
लेकिन मेरा मन केवल मधु की देवी पर आया!   
किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!
 

13 टिप्‍पणियां:

  1. जाने कितनी सजी-धजी तितलियाँ घूमती वन में,
    लेकिन मेरा मन केवल मधु की देवी पर आया!

    Ye Devi kon hai...??? bahut khub

    जवाब देंहटाएं
  2. kis ki prashansha kar rahe hain aap :) hamara bhi parichay karwayen kripya.. aadarniya se...

    जवाब देंहटाएं
  3. जाने कितने चेहरों का दिग्दर्शन मैंने पाया!
    किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!
    तुमको देखा है मैंने केवल मन की आँखों से,
    इसीलिए अपने मन को अन्यत्र नहीं भटकाया!
    --
    अपने ब्लॉग रवि मन पर लगी पोस्ट जादू पर आपके कमेंट के रूप में ये पंक्तियाँ पढ़ी थीं!
    यहाँ तो पूरा गीत ही तैयार है!
    --
    वाह, क्या जादू है!
    --
    यह जादू केवल आप ही कर सकते हैं!

    जवाब देंहटाएं
  4. आदरणीय टिप्पणीकारों!
    "रविमन" पर टिप्पणी करते हुए गीत बन गया है।

    जवाब देंहटाएं
  5. चितवन तो बाँकी थी पर लावण्य नही था उनमें,
    सीधी-सादी अमराई ने ही मुझको ललचाया!
    किन्तु आपके मुखड़े ने मन मेरा बहुत लुभाया!!
    बेहतरीन। लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  6. लेकिन मेरा मन केवल मधु की देवी पर आया.nice

    जवाब देंहटाएं
  7. kis kis pankti ki prashansa karoon........har pankti lajawaab hai........bahut hi sundar ,seedhe dil mein utar gayi kavita.
    premi hriday ke udgaron ko bahuthi sundar shabdon mein piroya hai.

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत लाजवाब, आपकि तो बात ही निराली है.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  9. भावों की कोमलता साफ़ दृष्टिगत हो रही है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  10. बढ़िया कविता शास्त्री जी , मगर साथ में एक गुस्ताकी भी कर रहा हूँ , जिसके लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ ! और गुस्ताखी यह है कि मस्का लगाना तो कोई आप से सीखे !:) वैसे उच्चारण के मुखपृष्ठ का का नया परिदृश्य पसंद आया !

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  11. हर एक पंक्तियाँ इतना सुन्दर और लाजवाब है कि आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ की जाये कम है! उम्दा रचना और साथ में तस्वीर बहुत अच्छी लगी!

    जवाब देंहटाएं
  12. "चितवन तो बाँकी थी पर लावण्य नही था उनमें,
    सीधी-सादी अमराई ने ही मुझको ललचाया!"
    "अमराई" सर्वश्रेष्ठ है शास्त्री जी कोई शक नहीं - प्रत्येक बंध गजब का बहुत प्यारी रचना - आभार और धन्यवाद्.

    जवाब देंहटाएं

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