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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

"सूरज और कुहरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 15012010056
कुहरे और सूरज में,जमकर हुई लड़ाई। 
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।। 

ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता, 
लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता, 
बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।। 

साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा, 
कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,
निर्धन की ठिठुरन से होती हाड़-कँपाई। 
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।। 

कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले, 
ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले, 
सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई। 
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शास्त्रीजी ,

    सूरज और कुहरे की लड़ाई का बहुत ही सहज और सरल भाषा में छंदबद्ध चित्रण किया है आपने !

    आप जैसे सरस्वतीपुत्र को प्रणाम ही कर सकता हूँ |

    उत्तर देंहटाएं
  2. aadarniya shahstriji namaskar ! kohre aur suraj ke beech ke dwand ko sundarta se chitrit kiya hain... aapki kavitaayen pant kee kavitaaon ke kareeb lagt hain.. sadar

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut khub sir...kitne pyare sabdo se apne kohre ko jeeta diya...

    उत्तर देंहटाएं
  4. साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा,
    कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,
    निर्धन की ठिठुरन से होती हाड़-कँपाई।
    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।
    अच्छी कृति !

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह ! शास्त्री जी बहुत सुन्दर लिखा है.. और यही सत्य है... आज यहाँ तो फिर बदल छ गए है.. सूरज हरा और हम भी ठण्ड से हार गए हैं... बहुत ठंडा हो गया है पहाड़ों में... आपकी कविता सार्थक..

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुबह होते ही प्रारम्भ हो जाती है लड़ाई और चलती रहती है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सूरज और कुहरे की लड़ाई सुबह होते ही प्रारम्भ हो जाती है
    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,
    ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,

    बहुत सुन्दर..गरीबों के दर्द को बहुत सुंदरता से उकेरा है..आशा है कि शीघ्र ही सूरज की कोहरे पर विजय होगी. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनायें. आभार

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  9. सर्दी के इस मौसम की बेहतरीन रचना!

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  10. सूरज की होगी नहीं मात
    कुहरे को चीरकर
    आएगा प्रभात

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  11. अभी तो ऐसा ही माहौल है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मकर संक्रांति के बाद हालत बदलनी शुरू होगी।

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  12. मौसम के अंदाज़ को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है

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  13. कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले, ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले, सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई। जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।

    शास्त्री जी नमस्कार,
    बहुत ही सहजता से आपने बड़ी गंभीर बातें लिखी हैं -
    बहुत सार है आपके लेखन में -
    बधाई एवं शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  14. कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,
    ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,
    सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।
    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

    बहुत ही सहजता से बेहद गंभीर बात कह दी और यही आपकी खासियत है…………एक बेहद उम्दा रचना।

    उत्तर देंहटाएं

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