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बुधवार, 19 जनवरी 2011

"गोरा-चिट्टा कितना अच्छा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
गोरा-चिट्टा कितना अच्छा।
लेकिन हूँ सूअर का बच्चा।।

लोग स्वयं को साफ समझते।
लेकिन मुझको गन्दा कहते।।

मेरी बात सुनो इन्सानों।
मत अपने को पावन मानों।।

भरी हुई सबके कोटर में। 
तीन किलो गन्दगी उदर में।।

श्रेष्ठ योनि के हे नादानों।
सुनलो धरती के भगवानों।।

तुम मुझको चट कर जाते हो।
खुद को मानव बतलाते हो।।

भेद-भाव मुझको नहीं आता।
मेरा दुनिया भर से नाता।।

ऊपर वाले की है माया।
मुझे मिली है सुन्दर काया।।

साफ सफाई करता बेहतर।
मैं हूँ दुनियाभर का मेहतर।। 

35 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो गज़ब कर दिया……………यही होती है सूक्ष्म दृष्टि……………जो कंकर मे से भी मोती चुन लेती है…………………शानदार रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. नमस्कार शास्त्री जी ....लाजवाब .... बॉल कविता बहुत ही कमाल की है ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति सुन्दर बात
    सब में राम वसे तो फिर भेद भाव कैसा
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाकई इस बार तो आपके द्वारा कंकर से मोती ही चुना गया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आद.शास्त्री जी,
    आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाय कम है !
    बाल कविता में भी आपने इतनी गहराई भर दी है कि पढ़ कर मन सोचने पर विवश हो जाता है !

    "श्रेष्ठ योनि के हे नादानों।
    सुनलो धरती के भगवानों।।

    तुम मुझको चट कर जाते हो।
    खुद को मानव बतलाते हो।।"

    वाह! क्या बात है !
    हिंदी ब्लाग जगत को समृद्ध करने में आपका योगदान सराहनीय है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (20/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. सूअर पर आज ही सुबह सरस पायस पर एक कविता पढ़ी थी . अब आपकी भी कविता पढ़ी . लगता है , आप और रावेन्द्र रवि की सांठ-गाँठ है . एक ही दिन में ;एक ही स्थान से ;एक ही विषय की पुनरावृत्ति . ...बहुत खूब ... . आप दोनों को बधाई .

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंवर की प्रतिक्रया ;
    खुद सुवरों जैसी हरकत करते है
    उस पर सुंवर मुझे कहते है,
    जिस दिन अपनी पे आउंगा,
    घुर-घुर्र गुर्राउंगा ,
    सूंड से इनकी जड़े खोद डालूँगा,
    बिन उर्बरा,ये अकुलाहट इतनी पायेंगे ,
    मुझे सुंवर कहना भूल जायेंगे !!

    उत्तर देंहटाएं
  9. डॉ. नागेश जी,
    डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी की
    यही तो सबसे विशिष्ट ख़ूबी है कि वे किसी
    एक विषय पर कोई कविता पढ़ते ही
    उस विषय पर अपनी कविता लिख लेते हैं!
    --
    डॉ. मयंक एक विलक्षण आशुकवि हैं!
    इस काम में उन्हें ज़रा-सी भी देर नहीं लगती!
    --
    "सरस पायस" तो प्रारंभ से ही
    उनके लिए प्रेरणा-स्रोत रहा है
    और वे इस तरह से प्रेरणा लेकर
    कविताएँ लिखते रहे हैं!
    --
    आइए,
    "सरस पायस" पर प्रकाशित
    चंद्रमोहन दिनेश जी की
    वह कविता भी पढ़ लेते हैं,
    जिससे प्रेरणा लेकर उन्होंने यह कविता लिखी!
    --
    आओ पास, तुम्हें नहलाऊँ

    उत्तर देंहटाएं
  10. हर विषय पर महारत हासिल है ..सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  11. मयंक जी ने निम्नांकित शीर्षक से इसे
    अपने ब्लॉग "नन्हे सुमन" पर भी
    साथ ही साथ प्रकाशित किया है -
    --
    सूअर का बच्चा
    --
    इसी शीर्षक से खटीमा के
    मशहूर ब्लॉगर डॉ. सिद्धेश्वर जी भी
    अपने ब्लॉग "कर्मनाशा" पर
    एक कविता प्रकाशित कर चुके हैं!
    --
    वीरेन डंगवाल की कविता 'सूअर का बच्चा

    उत्तर देंहटाएं
  12. कभी सोचा न था कि मेरी प्रिय पुस्तक ऐनिमल फार्म (ले. जॉर्ज ऑर्वेल)के नाय्क पर आपकी कविता पढने को मिलेगी!
    सुंदर कविता एक असुदर "व्यक्तित्व" पर!

    उत्तर देंहटाएं
  13. अरे!
    आलोकिता पर भी नाइस का असर होने लगा है!

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत सुंदर कविता, हमारे यहां कहते हे कि सुअर सब से साफ़ सफ़ाई वाला जानवर हे,

    उत्तर देंहटाएं
  15. सरल शब्दों में प्रकृति में संतुलन का महत्व समझा दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  16. सूक्ष्म दृष्टि ..गहरा अवलोकन...

    उत्तर देंहटाएं
  17. साफ सफाई करता बेहतर।
    मैं हूँ दुनियाभर का मेहतर।।

    आपकी क़लम किसी भी विषय पर लिखने की ताकत रखती है. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  18. .

    "एक मासूम से दिखने वाले सूअर ने
    एक कुत्ते के मासूम से नवजात बच्चे को खा लिया."
    फिर वही अपनी मासूम सी सूरत लिये मुझे एक अन्य दिन दिखायी दिया.
    मैंने (कवि ने) उसकी पिछली हरकत से बेखबर होकर उसकी दरिद्रता पर अश्रुपात किया.
    तब उसकी इस करनी के बारे में मुझे उस भुक्तभोगी स्वान-पालक भाई ने बताया.
    मैंने कहा - सूअर मांस नहीं खाते.
    स्वान-पालक ने कहा - भूख में सब कुछ खा जाते हैं. कुछ लोग नज़र बचाकर पाप करते हैं. सामने शरीफ बने रहते हैं.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  19. .

    [१] क्या सभी मासूम से दिखने वाले जीव 'गंदगी में रहने' और 'गंदगी खाने' के कारण मात्र से ही सहानुभूति के पात्र हो जाते हैं?
    यदि ऐसा है तो सभी जीवों की बुरी वृत्तियों को नज़रंदाज़ करना होगा.
    — बिल्लियों से छींके की रखवाली करवानी होगी.
    — बंदरों से घर की साज-सज्जा करवानी होगी.
    — कुत्तों से द्वार पर नये-नये आगंतुकों का स्वागत करवाना होगा.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  20. .

    [२] क्या जानवरों पर लिख देने मात्र से कविता बच्चों की हो जाती है?

    .

    उत्तर देंहटाएं
  21. .

    [३] यह जरूर है कि कविता अमुक जीव की विशेषता बयान कर रही है लेकिन इसे एक अच्छी संदेशपरक कविता नहीं कहा जा सकता.
    क्योंकि सूअर का स्वभाव है गंदगी को खाना. उसे ज्ञान नहीं है गंदगी का.
    — जो गंदा जानकार उसे साफ़ करने के लिये प्रयत्नशील होता है वह होता है काबिले-तारीफ़.
    — यदि सूअर को स्वच्छ पकवान मिलें तो क्या वह उन्हें नहीं खायेगा? जो उसकी पहुँच में होगा, जो उसे सहजता से मिल सकता है वही तो वह खायेगा.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  22. .

    नवीन संस्करण :

    गोरा-चिट्टा कितना अच्छा।
    लेकिन है सूअर का बच्चा।।

    लोग स्वयं को साफ समझते।
    शाम-सबेरे शौच परसते.

    मेरी बात सुनो इन्सानों !
    पेट साफ़ करके ही मानो.

    भरी गंदगी सब कोटर में।
    सभी बराबर एक नज़र में.

    श्रेष्ठ योनि के हे नादानों !
    करने जाओ खुले मैदानों.

    तुम मुझको चट कर जाते हो।
    मतलब अपना मल खाते हो.

    भेद-भाव मुझको नहीं आता.
    तभी तो सब कुछ मैं खा जाता.

    ऊपर वाले की है माया।
    अनजाने में सबकुछ खाया.

    साफ सफाई करता बेटर।
    मेरे लिये तो सारे वेटर.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  23. .

    वंदना जी का आभारी हूँ कि इतनी अच्छी कविता पढवायी.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  24. प्रतुल वशिष्ठ जी आपका टिप्पणियों के लिए आभारी हूँ!

    उत्तर देंहटाएं
  25. असुंदर में भी सुन्दर का दर्शन कराती है आपकी
    प्रभावशाली रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  26. चर्चा मंच से आप तक पहुची. बहुत ही अच्छा लगा आकर. और कविता तो सही में सुन्दर और सच का रूप दर्शा रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  27. प्रेरणा की प्रेरणा से मिली प्रेरणा!
    --
    प्रतुल वशिष्ठ जी का नवीन संस्करण भी बढ़िया है!

    उत्तर देंहटाएं
  28. कमाल है...यह आपकी लेखनी की ही खूबी है कि इस विषय पर भी इतनी सुन्दर कविता लिख दी..आभार

    उत्तर देंहटाएं

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