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गुरुवार, 13 जनवरी 2011

"धुँधलका बढ़ने लगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कुहासे का आवरण, आकाश पर चढ़ने लगा।।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,
आग का गोला शरद में पस्त सा  पड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

सर्द मौसम को समेटे, जागता परिवेश है, 
श्वेत चादर को लपेटे, झाँकता रजनीश है,
गगन के नयनों से शीतल अश्रुजल झड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा। 
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा आपने धुँधलका बढ़ने लगा !
    रेल, हवाई यात्रा का तभी तो समय बदलने लगा !
    गाड़ियाँ स्टेशन पर देर से आने लगी !
    सच कहा आपने धुंधलका असर दिखलाने लगी !

    खुबसूरत प्रस्तुति !

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  2. बहुत ठंड है..........बहुत ही सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. बस लगता है इस कोहरे के मौसम में खिड़की पर बैठकर लिखी कविता...

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  4. हमे तो चित्र देख कर ही ठंड लगने लग गई जी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. मौसम के अनुकूल.
    मकर संक्रान्ति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. लोहड़ी, मकर संक्रान्ति पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. एकदम मौसम के अनुकूल पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर.
    मकर संक्रांति की शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह सुन्दर. मौसम तो बस यही गाने का है. सुन्दर कविता.

    उत्तर देंहटाएं

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