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मंगलवार, 25 जनवरी 2011

"हबस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 जिन्दगी क्या, मौत पर भी अब हवस छाने लगी।
आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।

हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आज, आजादी निबल को हो रही।।

पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है।
हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।

उच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।

हबस के साये में ही, शासन-प्रशासन चल रहा।
हबस के साये में ही नर, नारियों को छल रहा।।

डॉक्टरों, कारीगरों को, हबस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हबस से, अपना मुँह मोड़ा नही।।

बस हबस के जोर पर ही, चल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहर, बन गयी अब चाकरी।।

हबस के बल पर हलाहल, राजनीतिक घोलते।
हबस की धुन में सुखनवर, पोल इनकी खोलते।।

चल पड़े उद्योग -धन्धे, अब हबस की दौड़ में।
पा गये अल्लाह के बन्दे, कद हबस की होड़ में।।

राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।।


15 टिप्‍पणियां:

  1. राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
    अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।
    सच ही है सटीक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  2. एकतरफा दृष्टिकोण है, इतना भी बुरा नहीं जमाना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
    अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।

    अगर ये हवस खत्म हो जाये तो दुनिया जन्नत न बन जाये…………बहुत सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बस हबस के जोर पर ही, चल रही है नौकरी।
    कामचोरों की धरोहर, बन गयी अब चाकरी।।
    सटीक रचना......

    उत्तर देंहटाएं
  5. राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
    अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।।

    यही आलम है हर तरफ ...क्या किया जाए !

    उत्तर देंहटाएं
  6. पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है।
    हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।


    उच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
    न्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।
    Mere man kee baat kah dee, bahut sundar !

    उत्तर देंहटाएं
  7. 'अब हवस शैतानियत की आँत जैसी हो गयी '
    आदरणीय शास्त्री जी ,
    देश और समाज की वर्तमान स्थिति की बहुत ही बेबाक और सटीक प्रस्तुति है आपकी रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  8. Nice post.
    26 जनवरी पर एक ख़ास अपील
    कुदरत क़ानून की पाबंद है लेकिन इंसान क़ानून की पाबंदी को अपने लिए लाज़िम नहीं मानता। इंसान जिस चीज़ के बारे में अच्छी तरह जानता है कि वे चीज़ें उसे नुक्सान देंगी। वह उन्हें तब भी इस्तेमाल करता है। गुटखा, तंबाकू और शराब जैसी चीज़ों की गिनती ऐसी ही चीज़ों में होती है। दहेज लेने देने और ब्याज लेने देने को भी इंसान नुक्सानदेह मानता है लेकिन इन जैसी घृणित परंपराओं में भी कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि ये रोज़ ब रोज़ बढ़ती ही जा रही हैं। हम अपनी सेहत और अपने समाज के प्रति किसी उसूल को सामूहिक रूप से नहीं अपना पाए हैं। यही ग़ैर ज़िम्मेदारी हमारी क़ानून और प्रशासन व्यवस्था को लेकर है। आये दिन हड़ताल करना, रोड जाम करना, जुलूस निकालना, भड़काऊ भाषण देकर समाज की शांति भंग कर देना और मौक़े पर हालात का जायज़ा लेने गए प्रशासनिक अधिकारियों से दुव्र्यवहार करना ऐसे काम हैं जो मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ भी हैं और इनसे आम आदमी बेहद परेशान हो जाता है और कई बार इनमें बेकसूरों की जान तक चली जाती है।
    इस देश में क़ानून को क़ायम करने की ज़िम्मेदारी केवल सरकारी अफ़सरों की ही नहीं है बल्कि आम आदमी की भी है, हरेक नागरिक की है। 26 जनवरी के मौक़े पर इस बार हमें यही सोचना है और खुद को हरेक ऐसे काम से दूर रखना है जो कि मुल्क के क़ानून के खि़लाफ़ हो। मुल्क के हालात बनाने के लिए दूसरों के सुधरने की उम्मीद करने के बजाय आपको खुद के सुधार पर ध्यान देना होगा। इसी तरह अगर हरेक आदमी महज़ केवल एक आदमी को ही, यानि कि खुद अपने आप को ही सुधार ले तो हमारे पूरे मुल्क का सुधार हो जाएगा।
    http://charchashalimanch.blogspot.com/2011/01/26th-january.html

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  9. बहुत सुन्दर रचना।
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाइयाँ !!

    Happy Republic Day.........Jai HIND

    उत्तर देंहटाएं

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