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शनिवार, 19 नवंबर 2011

"जन्म दिवस पर शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

दुर्गा की अवतार
श्रीमती इन्दिरा गांधी को
उनके 97वें जन्म दिवस पर
शत्-शत् नमन।
इन्दिरा प्रियदर्शिनी फिर से, आओ मेरे भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

आज वतन की बागडोर है, चंगुल में मक्कारों के,
वारे न्यारे हैं शासन में, आज कुटिल गद्दारों के,
फिर से लो अवतार, पुनःचण्डी बन आओ भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

मतवाला हो गया तन्त्र, घोटालों की लग गई झड़ी,
सत का पथ दिखलाने वाली, गाँधी की खो गई छड़ी,
स्वाभिमान की चिंगारी, सुलगाओ मेरे भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

बनकर श्वान चाटते तलवे, परदेशो में जाते हैं,
आन-बान को गिरवी रखकर, व्यंजन खूब उड़ाते हैं,
मानवता के पौधों को, फिर से उपजाओ भारत में।
दूरदृष्टि के मन्तव्यों को, लाओ मेरे भारत में।।

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के
जन्मदिवस पर नमन करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की

यह पूरी अमर कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।
-0-0-
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी।
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार।
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में।
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया।
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया।
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नब्वाबों के भी उसने पैरों को ठुकराया।
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात.
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात।
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात।
बंगाले-मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने।कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार।
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार।
यों परदे की इज्जत पर। देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान।
नाना धुंधुंपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरमन से आई थी।
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम।
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में।
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में।
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार।
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी।
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार।काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार।
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी।
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

♥ सुभद्रा कुमारी चौहान ♥

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छी कविता........श्रीमती इंदिरा गाँधी को उनके 97वे जन्म-दिवस पर हमारा भी शत-शत नमन !

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut achchi kavita likhi hai shreemati indira gandhi ji ko vinamra shradhanjli.

    उत्तर देंहटाएं
  3. इंदिराजी के जन्म दिवस पर आपके प्रेरक उद्गार स्तुत्य हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. इंदिरा जी के ९७ वें जन्मदिवस पर शत-शत नमन उन्हें, आपकी कविता बहुत ही अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  5. शत-शत नमन.ओजपूर्ण कविता में सार्थक आव्हान.

    उत्तर देंहटाएं
  6. इंदिरा जी के प्रति आपके सुंदर प्रेरक उदगार,
    शत शत नमन अति उत्तम पोस्ट,....
    मेरे पोस्ट पर भी पधारे,..स्वागत है ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. कालजयी कविता है सुभद्रा कुमारी चौहान की।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-704:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  9. श्रद्धांजलि और सुभद्रा जी की कविता दोनों बहुत अच्छी है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बुंदेलों हरबोलों के मुह हमने सुनी कहानी थी...

    वाह वाह आदरणीय शास्त्री सर जी इस गीत को पढ़कर आनंद आ गया.... सुभद्रा जी को नमन...

    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  11. दोनों वीरंगानायों को शत शत नमन

    उत्तर देंहटाएं
  12. dono hi kavita bahut hi acchi hai....dono virangniyo ko hamara naman...

    उत्तर देंहटाएं
  13. SHASTRI JI PANCHTANTAR PAR KISI KE DUARA KAVITAYE LIKHI GAYI THEE KABHI AAPKE DHAYAN MEIN AAYI HO TO KIRPYA NAAM AUR LINK PRESHIT KARNE KI PIRPA KARNA

    उत्तर देंहटाएं

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