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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

"रूप तुम्हारा प्यारा-प्यारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जल में-थल में, नीलगगन में,
जो कर देता है उजियारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप उसी का प्यारा-प्यारा।।

कलियाँ चहक रही उपवन में,
गलिया महक रही मधुबन में,
कल-कल, छल-छल करती धारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप उसी का प्यारा-प्यारा।।

पंछी कलरव गान सुनाते,
मेढक टर्र-टर्र टर्राते,
खिला कमल, बनकर अंगारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप उसी का प्यारा-प्यारा।।

सूरज जन-जीवन को ढोता,
चन्दा शीतल-शीतल होता,
दोनो हरते हैं अंधियारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप उसी का प्यारा-प्यारा।।

कोई भूले अपने पथ को,
रौशन करते सदा जगत को,
तुमने सबका काज सँवारा।
सबकी आँखों में सजता है,
रूप उसी का प्यारा-प्यारा।।

30 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर तस्वीर! शानदार कविता !

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  2. बड़ी ही मधुर व कर्णप्रिय कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. 'रूप' जी का यह रूप तो अनुपम है.
    प्यारा प्यारा ही नही न्यारा न्यारा भी.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर गीत है शास्त्री जी ।
    शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर और मधुर गीत है
    शुभकामनायें ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. शाश्त्री जी,सरल सुंदर शब्दों में खूबसूरती लिखी मनमोहक रचना,अच्छी पोस्ट
    समय निकाल कर कभी मेरे पोस्ट आइये...
    आपका स्वागत है,

    उत्तर देंहटाएं
  8. सबकी आँखों में सजता है,
    रूप हमारा प्यारा-प्यारा।।

    मन भावन रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर प्यारा गीत है सर,
    सादर बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुंदर प्रेरक गीत ।
    अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के पथ को प्रशस्त करने वाले हे सूर्य देव आप को प्रणाम ।

    उत्तर देंहटाएं

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