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शनिवार, 5 नवंबर 2011

"हार नहीं मानूँगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जब तक तन में प्राण रहेगा, हार नहीं मानूँगा।
कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।
टिक-टिक करती घड़ी, सूर्य-चन्दा चलते रहते हैं,
अपने मन की कथा-व्यथा को, कभी नहीं कहते हैं,
बिना वजह मैं कभी किसी से, रार नहीं ठानूँगा।
 कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।
जीवन के भवसागर से, नौका को पार लगाना है,
श्रम करके जीविका कमाना, सीधा पथ अपनाना है,
भोले-भाले, असहायों पर, शस्त्र नहीं तानूँगा।
कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।
जन्मभूमि के लिए जियूँगा, इसके लिए मरूँगा,
आन-बान के लिए देश की, अर्पण प्राण करूँगा,
 मर्यादा की सीमा को, मैं कभी नहीं लाघूँगा।
कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. भोले-भाले, असहायों पर, शस्त्र नहीं तानूँगा।
    कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।

    ...लाज़वाब...बहुत प्रेरक और ओजस्वी प्रस्तुति...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut achche vichar doosron ke liye seekh....bahut achchi kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रेरक भाव से ओतप्रोत रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. कर्तव्यों के बदले अधिकार नही मांगूगा...प्रेरक भाव की सुंदर रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनुपम कृति, सब कुछ स्पष्ट करती हुयी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक सुंदर सकारात्मक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  7. दिनकर जी की कविता सी लग रही है... अदभुद...

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर प्रेरक प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  10. bahut hi prabhavi rachana hai..
    pratyek pankti arthpurn hai..
    sarthak rachana

    उत्तर देंहटाएं
  11. कर्तव्यों के बदले में, अधिकार नहीं मागूँगा।।
    बहुत प्रेरक रचना सर,
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  12. आज तो अटलजी की याद दिला दी।

    उत्तर देंहटाएं

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