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बुधवार, 2 नवंबर 2011

"कंकरीटों का यहाँ जंगल उगाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जलाया खून है अपना, पसीना भी बहाया है।
कृषक ने अन्न खेतों में, परिश्रम से कमाया है।।

सुलगते जिसके दम से हैं, घरों में शान से चूल्हे,
उसी पालक को, साहूकार ने भिक्षुक बनाया है।

मुखौटा पहनकर बैठे हैं, ढोंगी आज आसन पर,
जिन्होंने कंकरीटों का, यहाँ जंगल उगाया है।

कहें अब दास्तां किससे, अमानत में ख़यानत है,
जमाखोरों का अब अपने, वतन में राज आया है।

पहन खादी की केंचुलिया, छिपाया रूप को अपने,
रिज़क इस देश का खाकर, विदेशी गान गाया है।

18 टिप्‍पणियां:

  1. पहन खादी की केंचुलिया, छिपाया “रूप” को अपने,
    रिज़क इस देश का खाकर, विदेशी गान गाया है।
    बेमिसाल...

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुखौटा पहनकर बैठे हैं, ढोंगी आज आसन पर,
    जिन्होंने कंकरीटों का, यहाँ जंगल उगाया है।

    पैना व्यंग्य.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन व्यंग्य!
    ---
    कल 04/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सही कहा आपने... सबुत और हरकते तो यही कहती है... फिर भी बच जाते हैं ये अमानत में खयानत रखने वाला...

    उत्तर देंहटाएं
  5. कहें अब दास्तां किससे, अमानत में ख़यानत है,
    जमाखोरों का अब अपने, वतन में राज आया है।

    पहन खादी की केंचुलिया, छिपाया “रूप” को अपने,
    "isliye" बच जाते हैं ये अमानत में खयानत रखने वाला...

    उत्तर देंहटाएं
  6. जो किसान हमारा पेट पालता है आज उसे ही हम बेघर, बेजमीन करने पर ऊतारूं हैं, बहुत बड़ी समस्‍या को आपने कविता के शब्‍दों में पिरोकर श्रेष्‍ठ कार्य किया है, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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