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रविवार, 27 नवंबर 2011

"आ गये फकीर हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


रोटियों को बीनने को, आ गये फकीर हैं।
अमन-चैन छीनने को, आ गये हकीर हैं।।

तिजारतों के वास्ते, बना रहे हैं रास्ते,
हरी घास छीलने को, आ गये अमीर हैं।

दे रहे हैं मुफ्त में, सुझाव भी-सलाह भी,
बादशाह लीलने को, आ गये वज़ीर हैं।

ज़िन्दगी के हाट में, बेचते हैं मौत को,
धीरता को जीमने को, आ गये अधीर हैं।

रूप वानरों सा है, दिल तो है लँगूर का,
मनुजना को पीसने को, आ गये कदीर हैं।

21 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक बार फिर --
    सामने आई
    आपकी सुन्दर प्रस्तुति ||

    बधाई आपको ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. वास्तविकता बताती सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सटीक और समसामयिक प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच है, हाल फकीरों जैसा हो गया है, हमारा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सही में आज आम आदमी हालत खस्ता ही होती जा रही है

    उत्तर देंहटाएं
  7. बिल्कुल सच कहा....सुन्दर प्रस्तुति ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. हरी घास छीलने को, आ गये अमीर हैं।
    क्या खूब ग़ज़ल लिखा है आपने!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गयी भगवान् !

    उत्तर देंहटाएं
  10. Nice post .
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा
    Bloggers' Meet Weekly men

    http://hbfint.blogspot.com/2011/11/19-happy-islamic-new-year.html

    उत्तर देंहटाएं
  11. ज़िन्दगी के हाट में, बेचते हैं मौत को,
    धीरता को जीमने को, आ गये अधीर हैं।
    वाह ...बिल्‍कुल सच कहती ये पंक्तियां ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. शास्त्री जी ने ओबामा के चित्र के साथ उनकी 'वालमार्ट 'आदि कंपनियों को फकीर बताया है और टिप्पणीकारों ने अपने देश की स्थिति पर ले लिया है। वस्तुतः ये विदेशी व्यापारी फकीर नहीं लुटेरे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  13. हमारा अपने-आप को लुटाने का शौक पुराना है,जो कायम है.सादार धन्यवाद,एक बार
    अपने-आप को देखने का.

    उत्तर देंहटाएं

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