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सोमवार, 28 नवंबर 2011

"आसमान में कुहरा छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

शीत बढ़ा, सूरज शर्माया।
आसमान में कुहरा छाया।।

चिड़िया चहकी, मुर्गा बोला,
हमने भी दरवाजा खोला,
लेकिन घना धुँधलका पाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

जाड़ा बहुत सताता तन को,
कैसे जाएँ सुबह भ्रमण को,
सर्दी ने है रंग जमाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

गज़क-रेवड़ी बहुत सुहाती,
मूँगफली सबके मन भाती,
दादी ने अलाव सुलगाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

शीतल तुहिन कणों को खाते,
गेंहूँ झूम-झूम लहराते,
हरियाली ने रूप दिखाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. क्‍या बात है? आज तो हमारे यहां भी कोहरा छाया हुआ है। प्रात: भ्रमण को जाने में आलस आने लगा है। बहुत ही अच्‍छा चित्र खींचा है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह! बहुत खूब लिखा है आपने ! ख़ूबसूरत रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  3. शब्द चित्र ने वातावरण को सजीव कर दिया है!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर भाव
    हरियाली ने रुप दिखाया, आसमान मेंकुहरा छाया।
    क्या कहने।

    उत्तर देंहटाएं
  5. झीनी झीनी एक चदरिया आसमान ने ओढ़ी अब तो।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह वाह... मजा आ गया सर...

    सुन्दर मौसम, सुन्दर गीत
    किट किट किट कर आया शीत....

    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  7. हर मौसम के अनुकूल आपका अंदाज़ निराला हो जाता है और हमें लगता है कि यह तो कितना सहज सरल है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ठंड का मौसम......
    बहुत अच्‍छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  9. प्रकृत रंग से रंगा - रँगाया।
    गीत आपका बहुत ही भाया।

    भाव मधुर मनभावन भाषा।
    शब्द-शब्द में गुंफित आशा।
    देख -निरख मन है हर्षाया।
    गीत आपका बहुत ही भाया।

    उत्तर देंहटाएं

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