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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

"ग़ज़ल - गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मोहब्बत की हसीं राहें
तुम्हारे प्यार को खुश्बू बसा, इस दिल में लाया हूँ
मोहब्बत की हसीं राहों में, यादें छोड़ आया हूँ

कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें
मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ

मेरी उल्फत की यादें, जब कभी तुम भूल जाओगे
चुभाने के लिये दिल में,  मैं काँटे छोड़ आया हूँ

जहाँ में खुश्बू-ए-गुल सा महकना, घर को महकाना
तुम्हारे बन्द कमरों में,  उजाले छोड़ आया हूँ

तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला
दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ

उन्हें अब दायरों में बाँधना, बदनाम करना है
महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ।
(गुरू सहाय भटनागर "बदनाम")

15 टिप्‍पणियां:

  1. वो गलियां आभी तक हसीनों-जवां हैं
    जहां जवानी मैं अपनी छोड़ आया हूँ |
    क्षमा .........!
    शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति .... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें
    मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ

    सुन्दरतम..

    उत्तर देंहटाएं
  4. उन्हें अब दायरों में बाँधना, “बदनाम” करना है
    महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ।

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  5. शानदार गजल।
    हर शेर लाजवाब।

    उत्तर देंहटाएं
  6. तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला
    दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ

    खूबसूरत अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  7. खूबशूरत गजल-गुरूसहाय जी की
    बेहतरीन पोस्ट....
    मेरी नयी पोस्ट "वजूद "में स्वागत है,

    उत्तर देंहटाएं
  8. ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  9. कभी जब याद करके गाँव ,की गल्यो से गुजरेंगे ....यादे ताउम्र साथ रहती है
    बहु अच्छा ../

    उत्तर देंहटाएं

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