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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

"मेला गंगास्नान-झनकइया-खटीमा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गंगास्नान के मेले का शेष भाग!
नदी शारदा में किया, उत्सव का स्नान।
फिर खिचड़ी खाकर किया, मेले को प्रस्थान।।
झनकइया वन में लगा, मेला बहुत विशाल।
वियाबान के बीच में, बिकता सस्ता माल।।
यहाँ सिँघाड़े बिक रहे, गुब्बारों की धूम।
मस्ती में-उल्लास में, लोग रहे हैं घूम।।
आदिवासियों ने यहाँ, डेरा दिया जमाय।
जंगल में मंगल किया, पिकनिक रहे मनाय।।
बहुत करीने से सजा, चाऊमिन का नीड़।
जिसको खाने के लिए, लगी बहुत है भीड़।।
फल के ठेले हैं यहाँ, फूलों की दूकान।
मनचाहा रँग छाँट लो, रंगों की है खान।।
गरमा-गरम जलेबियाँ, और पकौड़ी खाय।
मेला घूमों शान से, हज़म सभी हो जाय।।
सब्जी बिकती धान से, दाम नहीं है पास।
बिन पैसे के हो रहा, मेला आज उदास।।
ऊँचे झूले लगे हैं, भाँति-भाँति के खेल।
सर्कस के इस खेल मे, भारी धक्का-पेल।।
घर के दाने बिक रहे, बच्चों का है साथ।
महँगाई की मार से, बिगड़ रहे हालात।।
आओ अब घर को चलें, घिर आई है शाम।
जालजगत पर अब हमें, करना है कुछ काम।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. सचित्र मनभावन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  2. ख़ूबसूरत चित्रों के साथ सुसज्जित मनमोहक प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेले की सैर करवा दी आपने ....आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. humne bhi aapke saath mela ghoom liya garam garam jalebi dekhkar to muh me paani aa gaya.sachitra kaavya shaily me bahut sundar varnan.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर कविता.... मेले का सुन्दर भ्रमण....

    उत्तर देंहटाएं
  6. अद्भुत चित्रावली ..आनंद आ गया.

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर चित्रो के साथ मनभावन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अरे, वाह!
    पूरा मेला तो आपने यहीं दिखा दिया!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुंदर चित्रों से सजी बचपन कि याद दिलाती स्वादिष्ट पोस्ट :-) शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  10. मेले के यह चित्र तो लगे बहुत अभिराम।
    काव्यकला के'रूप'को मेरा नमन प्रणाम।

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुन मेले का नाम ही ,मन पुलकित हो जाय
    घर बैठे ही , आपने मेला दिया घुमाय.
    जंगल में भी पहुँच गया चाऊमिन है आज
    और कहाँ तक फैलेगा , फास्ट-फूड का राज.
    बौने जोकर दिख रहे , गुमसुम और उदास
    बीस रुपै की टिकट सुन ,कोई न आया पास.
    सब्जी के संग धान का,विनिमय अब भी होय
    इस युग में यह देख के , दिया कबीरा रोय.

    उत्तर देंहटाएं
  12. मेले का आनन्द उठा लिया....

    उत्तर देंहटाएं
  13. मेले का आनंद चित्रों व काव्य छंदों की अनूठी छटा। वाह! बहुत खूब।
    एक मेला हमने भी देखा था। एक गीत लिखा था। चार लाइन देखिए...

    हमने देखे गज़ब नजारे मेले में
    लाए थे वो चाँद-सितारे ठेले में

    भूखे बेच रहे थे दाना
    प्यासे बेच रहे थे पानी
    सूनी आँखें हरी चूड़ियाँ
    सबने बेच रहे थे ग्यानी

    बच्चों ने बेचे गुब्बारे मेले में।
    लाए थे वो चाँद-सितारे ठेले में।

    उत्तर देंहटाएं
  14. वाह!
    सुन्दर रचना से आपने ,दिल को लिया है मोह
    मनोहारी चित्रों की झांकी में,हम तो गए हैं खो

    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  15. यहाँ तो सब कुछ है... वाह!!
    बढ़िया पोस्ट सर...
    सादर बधाई...

    उत्तर देंहटाएं

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