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बुधवार, 9 नवंबर 2011

"शाकाहारी जीव की, गर्दन पर तलवार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


परम्पराएँ मिन्न हैं, फिर भी हैं सब एक।
कोई खोया खा रहा, कोई खाता केक।।

खाने-पीने के लिए, सबके अपने तर्क।
आओ मिल-जुलकर करें, स्वस्थ विचार-विमर्श।।

कोई झटका कर रहा, कोई करे हलाल।
इक दूजे की रीत पर, होते बहुत सवाल।।

कुर्बानी-बलिदान का, मतलब बिल्कुल साफ।
बलिदानों के वास्ते, निज गर्दन भी नाप।।

शाकाहारी जीव की, गर्दन पर तलवार।
केवल रसना के लिए, करते लोग प्रहार।।

32 टिप्‍पणियां:

  1. बढिया प्रस्‍तुति।
    सबको जीने का हक है..........

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुर्बानी-बलिदान का, मतलब बिल्कुल साफ।
    बलिदानों के वास्ते, निज गर्दन भी नाप।।

    true

    :(

    उत्तर देंहटाएं
  3. bahut prbhaav shali prastuti....shayad shaakahariyon logon ke liye hi.....suna hai shastri ji insaan ka maans to sabse testy hota hai fir to unhe door jaane ya jaanvar khareedne ki bhi jarooorat nahi ghar se hi shuru ho sakte hain.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया कविता.. निरीह सदैव से ही बलिदान दे रहे हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवन अमूल्य है, विशेषकर हिंसा के प्रदर्शन या महिमामंडन से बचा जाना चाहिये!

    उत्तर देंहटाएं
  6. क़ुरबानी और मांसाहार के बारे में आपने अपने मनोभाव को व्यक्त किया , यह ठीक है लेकिन आपको प्रतिपक्ष की बात पर भी ध्यान देना चाहिए।
    धन्यवाद !!!
    ‘चर्चा
    गोश्‍तखोरी-सब्‍जीखोरी debate स्‍वामी नित्‍यानंद और डाक्‍टर बशीर
    1910–1911 ई.

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्री जी,बलि चढाकर खुसी मनाना मेरे ख्याल से
    अनुचित है|मै आप से सहमत हूँ|विचारणीय रचना सुंदर पोस्ट ...
    मेरे नई पोस्ट =वजूद= में आप का स्वागत है...

    उत्तर देंहटाएं
  8. कुर्बानी-बलिदान का, मतलब बिल्कुल साफ।
    बलिदानों के वास्ते, निज गर्दन भी नाप।।

    बहुत पते की बात कही है आपने शास्त्री जी.
    यह बात सब समझ लें तो कल्याण हो जाये.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  9. कुर्बानी-बलिदान का, मतलब बिल्कुल साफ।
    बलिदानों के वास्ते, निज गर्दन भी नाप।।....सार्थक प्रस्तुति.. जीने का सब को हक है.....

    उत्तर देंहटाएं
  10. सत्य दर्शन करवाती रचना ....दर्दनाक ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. सत्य दर्शन करवाती रचना ....दर्दनाक ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. सत्य दर्शन करवाती रचना ....दर्दनाक ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. अरे बाप रे! शास्त्री जी कहां से खींच लाए ऐसन फोटो सब!
    उफ़्फ़!!
    आज तक इस विषय पर जितनी पोस्ट देखी, यह सबसे सही लगी।

    उत्तर देंहटाएं
  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  16. कटु सत्य का दर्शन कराती शानदार प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  17. शाकाहारी जीव की, गर्दन पर तलवार।
    केवल रसना के लिए, करते लोग प्रहार।।

    बढ़िया कविता........

    उत्तर देंहटाएं
  18. आदरणीय मयंक जी नमस्कार, बहुत सुन्दर लिखा है आपने कुर्बानी बलिदान का---------- निज गर्द्नन भी नाप्। मेरे सभी ब्लाग पर आपको आमन्त्र्ण है समीक्षा हेतु रचनाओ पर मैने भी एक आलेख लिखा था मानवीयता के नज्रिये से ह्मारे बारे मे सोचें प्रगतिशील ब्लाग सघं पर पोस्ट भी किया था जरुर देखे ।

    उत्तर देंहटाएं
  19. "ज़िंदा रहो स्वयं भी दूसरों के भी न प्राण लो
    मन्त्र मूल है यही इस, सृष्टि के संचार का.."

    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  20. प्रणाम!!
    कुर्बानी-बलिदान का, मतलब बिल्कुल साफ।
    बलिदानों के वास्ते, निज गर्दन भी नाप।।

    एक तर्क में हो गया, बलिदान का मतलब साफ।
    जान सभी को प्यारी है, जगत का है इन्साफ।

    उत्तर देंहटाएं
  21. Bahut hi Ghatiya Rachna hai, meri apatti darj ki jay... Halanki Mansahaar ke khilaaf hoti to mujhe koi apatti nahi hoti...

    उत्तर देंहटाएं
  22. बहुत सही कहा आपने!
    पर अब सही और सच कौन सुनते हैं?
    सब अब भगवन को खून से खुश होने वाला पिचास समझते हैं... और दो दिन पुराने बकरे को सबसे प्यारा कहते हैं....|
    ये लोग भगवन के आँखों में धुल झोंक रहे हैं चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान..

    उत्तर देंहटाएं
  23. बडी मार्मिक प्रस्तुति!!

    हिंसा निवारण प्रयास के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं

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