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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

‘‘जिन्दगी की है बहार-श्रीमती आशा शैली’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गीत, खुशबू और थोड़ी सी फुहार
बस यही तो जिन्दगी की है बहार


आम्र तरु-फुनगी की ललछौंही छटा
घिर के छम-छम बरसती नभ से घटा
हरित-गर्भा यह धरा होने लगे
तब समझना सृष्टि हित कुछ सुख बँटा

फिर से जब आने लगे रुत पर निखार
बस यही तो जिन्दगी की है बहार

खेतिहर ने हल उठाया हरष कर
दे चले आशीष बादल बरस कर
हुमक-कर बहने नदी-नाले लगे
उतर आया स्वर्ग इस पल धरा पर

पक्षियों की खेत में उतरे कतार
बस यही तो जिन्दगी की है बहार

घन-गगन पर्वत से जब मिलने लगे
बाग सारा मोद में खिलने लगे
मन्द चलती पवन भी इठला उठे
और उदासी की शिला हिलने लगे

बाग में जाने का मन हो बार-बार
बस यही तो जिन्दगी की है बहार

श्रीमती आशा शैली 

11 टिप्‍पणियां:

  1. गीत, खुशबू और थोड़ी सी फुहार
    बस यही तो जिन्दगी की है बहार
    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच ऐसी ही है जिंदगी की बहार!
    सुंदर प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  3. गीत, खुशबू और थोड़ी सी फुहार
    बस यही तो जिन्दगी की है बहार... bhaut hi khubsurat....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति...
    मेरे पोस्ट पर स्वागत है...

    उत्तर देंहटाएं
  5. गीत, खुशबू और थोड़ी सी फुहार
    बस यही तो जिन्दगी की है बहार...

    वाह!! बहुत खूब....
    सादर बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  6. न जाने कितने आनन्ददायक तत्व हैं प्रकृति में...सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  7. फिर से जब आने लगे रुत पर निखार
    बस यही तो जिन्दगी की है बहार....


    बहारें फिर भी आती ही रहती हैं...

    उत्तर देंहटाएं

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