"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 31 जनवरी 2011

"यह है अपना सच्चा भारत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सुन्दर-सुन्दर खेत हमारे।
बाग-बगीचे प्यारे-प्यारे।।
पर्वत की है छटा निराली।
चारों ओर बिछी हरियाली।।
सूरज किरणें फैलाता है।
छटा अनोखी बिखराता है।।

तम हट जाता, जग जगजाता।
जन दिनचर्या में लग जाता।।

चहक उठे हैं घर-चौबारे।
महक उठे कच्चे-गलियारे।।
गइया जंगल चरने जाती।
हरी घास मन को ललचाती।।

 नहीं बनावट, नहीं प्रदूषण।
यहाँ सरलता है आभूषण।।
खड़ी हुई मजबूत इमारत।
यह है अपना सच्चा भारत।।

रविवार, 30 जनवरी 2011

"मेरी अगली पुस्तक-हँसता-गाता बचपन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


"मुख्यमन्त्री ने किया दोनों पुस्तकों का लोकार्पण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

उत्तराखण्ड के यशस्वी मुख्यमन्त्री 
माननीय डॉ. रमेश पोखरियाल "निशंक" ने
मेरी दोनों पुस्तकों 
"सुख का सूरज" और "नन्हें सुमन" का लोकार्पण 
देवभूमि उत्तराखण्ड की 
जनता-जनार्दन के सामने किया!
आज उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमन्त्री
डॉ. रमेश पोखरियाल "निशंक"
मा.पुष्कर सिंह धामी
(उपाध्यक्ष-शहरी विकास अनुश्रवण परिषद्)
के विवाह समारोह में खटीमा पधारे।
इस अवसर पर उन्होंने मेरी दोनों पुस्तकों 
"सुख का सूरज" और "नन्हें सुमन" का लोकार्पण 
देवभूमि उत्तराखण्ड की 
जनता-जनार्दन के सामने किया!
मैं माननीय मुख्यमन्त्री जी का हृदय से आभारी हूँ!
जनता के बीच मा.मुख्यमन्त्री जी
पुस्तकों के लोकार्पण के पश्चात मंच से नीचे उतरते हुए

शनिवार, 29 जनवरी 2011

"आया बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सबके मन को भाया बसन्त।
आया बसन्त-आया बसन्त।।
उतरी हरियाली उपवन में,
आ गईं बहारें मधुवन में,
गुलशन में कलियाँ चहक उठीं,
पुष्पित बगिया भी महक उठी, 
अनुरक्त हुआ मन का आँगन।
आया बसन्त, आया बसन्त।१।
कोयल ने गाया मधुर गान,
चिड़ियों ने छाया नववितान,
यौवन ने ली है अँगड़ाई,
सूखी शाखा भी गदराई,
बौराये आम, नीम-जामुन।
आया बसन्त, आया बसन्त।२।
हिम हटा रहीं पर्वतमाला,
तम घटा रही रवि की ज्वाला,
गूँजे हर-हर, बम-बम के स्वर,
दस्तक देता होली का ज्वर,
सुखदायी बहने लगा पवन।
आया बसन्त, आया बसन्त।३।
खेतों में पीले फूल खिले,
भँवरे रस पीते हुए मिले,
मधुमक्खी शहद समेट रही,
सुन्दर तितली भर पेट रही,
निखरा-निखरा है नील गगन।
आया बसन्त, आया बसन्त।४।

(चित्र गूगल छवियों से साभार)

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

"पिछले वर्ष आज के ही दिन यह रचना लिखी थी!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

पिछले वर्ष आज के ही दिन यह रचना लिखी थी!
“लगता है बसन्त आया है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

>> बृहस्पतिवार, २८ जनवरी २०१०

 टेसू की डालियाँ फूलतीं, 
खेतों में बालियाँ झूलतीं, 
लगता है बसन्त आया है! 

केसर की क्यारियाँ महकतीं, 
बेरों की झाड़ियाँ चहकती, 
लगता है बसन्त आया है!

sun 
आम-नीम पर बौर छा रहा, 
प्रीत-रीत का दौर आ रहा, 

लगता है बसन्त आया है!
सूरज फिर से है मुस्काया , 
कोयलिया ने गान सुनाया, 
लगता है बसन्त आया है! 
जय हो जय, शिव-शंकर की जय!
(यह चित्र सरस पायस से साभार)
शिव का होता घर-घर वन्दन, 
उपवन में छाया स्पन्दन, 
लगता है बसन्त आया है!
 

(अन्य सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

"आज कुछ दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 (1)
छन्द-शास्त्र गायब हुए, मुक्त हुआ साहित्य।
गीत और संगीत से, मिटा आज लालित्य।।
(2)
निकल गई है आत्मा, काव्य हुआ निष्प्राण।
नवयुग में गुम हो गये, सतसय्या के बाण।।
(3)
कविता में मिलता नही, भक्ति सा आनन्द।
फिल्मी गानों ने किये, भजन-कीर्तन बन्द।।
(4)
तुलसी, सूर-कबीर की, मीठी-मीठी तान।
निर्गुण-सगुण उपासना, भूल गया इन्सान।।
(5)
प्रेमदिवस के नाम पर, पोषित भ्रष्टाचार।
शिक्षित यौवन कर रहा, खुलकर पापाचार।।

बुधवार, 26 जनवरी 2011

"अब बसन्त आने वाला है" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक")


जेठ और आषाढ़ माह में,
फूल बसन्ती जैसे खिलते।
लू के गरम थपेड़े खा कर,
अमलतास के झूमर हिलते,
सेमल के इस महावृक्ष का,
पतझड़ में गदराया तन है।
पत्ते सारे सिमट गये हैं,
शाखाओं पर लदे सुमन हैं।।
टेसू के पेड़ों पर भी तो,
लाल अँगारे दहक रहे हैं।
अद्भुत् छटा वनों में फैली,
कुसुम डाल पर चहक रहे हैं।।

देते हैं सन्देश हमें यह,
अब बसन्त आने वाला है।
धूप गुनगुनी बोल रही है,
अब जाड़ा जाने वाला है।।
बासन्ती परिधान पहनकर
सरसों पीली फूल रही है।
गेंहूँ के कोमल बिरुओं पर,
हरी बालियाँ झूल रहीं हैं।।
प्रेमदिवस आने वाला है,
मस्त नज़ारों में खो जाएँ।
मौसम आमन्त्रण देता है,
खुश होकर हम नाचें-गाएँ।।

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

"हबस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 जिन्दगी क्या, मौत पर भी अब हवस छाने लगी।
आदमी को, आदमी की हबस ही खाने लगी।।

हबस के कारण, यहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आज, आजादी निबल को हो रही।।

पालिकाओं और सदन में, हबस का ही शोर है।
हबस के कारण, बशर लगने लगा अब चोर है।।

उच्च-शिक्षा में अशिक्षा, हबस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की ही, होड़ जैसी चल रही।।

हबस के साये में ही, शासन-प्रशासन चल रहा।
हबस के साये में ही नर, नारियों को छल रहा।।

डॉक्टरों, कारीगरों को, हबस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हबस से, अपना मुँह मोड़ा नही।।

बस हबस के जोर पर ही, चल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहर, बन गयी अब चाकरी।।

हबस के बल पर हलाहल, राजनीतिक घोलते।
हबस की धुन में सुखनवर, पोल इनकी खोलते।।

चल पड़े उद्योग -धन्धे, अब हबस की दौड़ में।
पा गये अल्लाह के बन्दे, कद हबस की होड़ में।।

राजनीति अब, कलह और घात जैसी हो गयी।
अब हबस शैतानियत की, आँत जैसी हो गयी।।


सोमवार, 24 जनवरी 2011

"मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



अंग्रेजी से ओत-प्रोत,
अपने भारत का तन्त्र,
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।

बिगुल बजा कर आजादी का,
मौन हो गई भाषा,
देवनागरी के सपनों की,
गौण हो गई परिभाषा,
सब सुप्त हो गये छंद-शास्त्र,
अभिलुप्त हो गये मन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कहाँ गया गौरव अतीत,
अमृत गागर क्यों गई रीत,
क्यों सूख गई उरबसी प्रीत, 
खो गया कहाँ संगीत-गीत,
इस शान्त बाटिका में, 
किसने बोया ऐसा षडयन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

कभी थे जो जग में वाचाल,
हुए क्यों गूँगे माँ के लाल,
विदेशों में जाकर सरदार,
हुए क्यों भाषा से कंगाल,
कर रहे माँ का दूध हराम,
यही है क्या अपना जनतन्त्र।
मनाएँ कैसे हम गणतन्त्र।।

रविवार, 23 जनवरी 2011

"शायर सगीर अशरफ की एक ग़ज़ल" प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

"शायर सगीर अशरफ की एक ग़ज़ल"

मुझे महसूस यह होने लगा है
मेरा पैकर पिघलता जा रहा है

बिछड़कर उससे यूँ लगता है जैसे
कि वो भी आज तन्हा रह गया है

वो कला का इक नादिर नमूना
जो हर किरदार में सच बोलता है

बहुत हस्सास है गूँगा है "अशरफ"
मगर हद से ज़्यादा बोलता है
सग़ीर अश़रफ़

शनिवार, 22 जनवरी 2011

एक जरूरी सूचना ...........

 एक जरूरी सूचना ...........

मिडिया के साथ ब्लॉगर मीट दिल्ली में 

आज दिल्ली के आदर्श नगर शिव मंदिर में ब्लॉगर मीट का आयोजन किया गया  जिसमे मुख्य अतिथि के रूप में  मदन विरक्त जी लक्ष्मी नगर से तथा डॉक्टर के . डी. कनोडिया आदर्श नगर से पधारे ...........इन सबके अलावा अविनाश वाचस्पति जी , राजीव  तनेजा जी , अजय कुमार झा जी , इंदु पूरी जी , वंदना गुप्ता जी , संगीता स्वरुप जी , पवन चन्दन चौखट जी , केवल राम जी , पदम् सिंह जी , उपदेश सक्सेना जी ,सुमित प्रताप जी और मेरे समेत काफी ब्लोगर्स  तथा मिडिया से जुड़े लोग एकत्रित हुए ............अभी सिर्फ इतना ही बाकी पूरा समाचार कल देखिएगा ............फ़िलहाल एक सूचना ….

आज के कार्यक्रम को 
आप इंडिया न्यूज़ चैनल पर
आज शाम ७:३० बजे देख सकते हैं .


"श्रीमती आशा शैली की एक ग़ज़ल" प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

"श्रीमती आशा शैली की एक ग़ज़ल"
मेरी और तुम्हारी बातें
सारे जग से न्यारी बातें

किसने घड़ी-सँवारी बातें
देखो इतनी सारी बातें

जग के हाहाकार भूलकर
आ कर लें कुछ प्यारी बातें

मुख से निकली हुईं पराई
कन्या सी बेचारी बातें

मुझको याद हैं पल-पल छिन-छिन
तुमने कहाँ बिसारी बातें

मेरे मित्र मेरे शुभचिंतक
सब करते संसारी बातें

दुनिया की बातों में मत आ
ये तलवार दुधारी बातें

मन के रोम-रोम में चुभतीं
पैनी तीव्र कटारी बातें

ऐ-शैली संध्या होते ही
आ पहुँची हत्यारी बातें
श्रीमती आशा शैली "हिमाचली"

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails