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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

"बुड्ढों को पाँव जमाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ए-के सैंतालीस, अस्त्र-शस्त्र, बेकार सभी हो जायेंगे।
अणु और परमाणु-बम भी, सफल नही हो पायेंगे।।

सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को।
सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।।

शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही।
छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।।

फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा।
उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा।

नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें।
युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।।

शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से।
इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।।

रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों।
लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।।

सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।
सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।

गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे।
तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।।

मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।

सेना में इन वृद्धजनों को, निज जौहर दिखलाना है।
युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों को पाँव जमाना है।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
    भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।
    vaah,....vaah ...vaah kitna gajab ka vyang kiya hai shastri ji sahi me in netaon ko fauj me vo bhi border par bhej dena chahiye.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हराम का खाने वाले नौकरी कैसे करगें.....

    MY NEW POST ...काव्यान्जलि ...होली में...

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह बहुत बढ़िया लिखा सर...

    उत्तर देंहटाएं
  4. सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है । चूंकि कविता अनुभव पर आधारित है, इसलिए इसमें अद्भुत ताजगी है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जब नकली दांत लगाकर ये ऊंचे स्वर में चिल्लायेंगे,
    अच्छे खासे फौजी सारे, रण छोड़ भागते जायेंगे,
    उल्टे सीधे दे दे के ब्यान, ये सबको खूब रुलायेंगे,
    ये एक अकेले ही भारी, पलटन पर पड़ जायेंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सेना में इन वृद्धजनों को, निज जौहर दिखलाना है।
    युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों को पाँव जमाना है।।
    नितांत मौलिक संकल्पना है शाष्त्री जी की इसका पेटेंट करवा ना चाहिए अमरीका अपनी बतला सकता है .

    उत्तर देंहटाएं
  7. नेताओं पर कर रहे, शास्त्री जी जब व्यंग ।
    होली में जैसे लगा, तारकोल सा रंग ।

    तारकोल सा रंग, बड़ी मोती है चमड़ी ।
    नेताओं के ढंग, देश बेंचे दस दमड़ी ।

    बेचारी यह फौज, आज तक बचा रही है ।
    करें अन्यथा मौज, नीचता लिमिट नहीं है ।।

    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
    http://dineshkidillagi.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. करें अन्यथा मौज, नीचता नचा रही है ।।

      हटाएं
    2. बहुत बहुत आभार गुरु जी ||

      हटाएं
  8. मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
    भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।
    रोचक !

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-805:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

    उत्तर देंहटाएं
  10. शुक्रवारीय चर्चा मंच पर आपका स्वागत
    कर रही है आपकी रचना ||

    charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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