"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 2 सितंबर 2012

ग़ज़ल "उल्लओं की पंचायतें लगीं थी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गैरों ने वफा की थी, अपनों ने जफा की थी।
दिल का नहीं था रिश्ता, कैसी ये दिल्लगी थी।।

रिश्तों की गर्मजोशी, मौसम से थीं नदारत,
कड़वाहटों से बोझिल, वो शाम नग़मग़ी थी।

बेमन से बुलबुलें सब, कुछ गुनगुना रहीं थीं,
महफिल में आज उनके, सुर में न ताजग़ी थी।

जंगल में राजशाही की हो रही फज़ीहत,
हर ओर उल्लओं की, पंचायतें लगीं थी।

वानर का रूप पाकर, नारद चहक रहा था,
दैरो-हरम में बन्दी, लाचार बन्दग़ी थी।

17 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों की गर्मजोशी, मौसम से थीं नदारत,
    कड़वाहटों से बोझिल, वो शाम नग़मग़ी थी
    वाह सर वाह क्या बात है,

    उत्तर देंहटाएं
  2. जंगल में राजशाही की हो रही फज़ीहत,
    हर ओर उल्लओं की, पंचायतें लगीं थी।
    बेहद खुबसूरत...सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर


    जंगल में राजशाही की हो रही फज़ीहत,
    हर ओर उल्लओं की, पंचायतें लगीं थी।

    अब कुछ कहने की जरूरत ही नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  4. बात समझ में आ रही,चाहते क्या कहना
    आगे पंचायतों से ,सदा बचकर रहना,,,

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेमन से बुलबुलें सब, कुछ गुनगुना रहीं थीं,
    महफिल में आज उनके, सुर में न ताजग़ी थी।

    जंगल में राजशाही की हो रही फज़ीहत,
    हर ओर उल्लओं की, पंचायतें लगीं थी।

    गज़ब की प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. उनकी थी ऐसी फितरत पंचायतें लगाना
    अपराध तो हुआ है उस खाप में भी जाना
    सोचा नहीं था शायद ऐसा सबक मिलेगा
    हर एक कदम भी अब तो बस फूंक कर पड़ेगा

    उत्तर देंहटाएं
  7. आँधी-सी इक चली थी,यूँ धूल उड़ रही थी
    थी किरकिरी मिठाई, जो प्रेम में पगी थी |
    चाहत-वफा के पत्ते , शाखों से झर रहे थे
    रिश्तों की गर्म जोशी,हिमखण्ड-सी गली थी |

    वाह !!!! शानदार गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  8. जंगल में ये अ-मंगल हुआ कैसे ?
    सारा जहान बे-वफ़ा हुआ कैसे ?
    वफादारों की पंचायत में भला,
    सियासत का रोग लगा कैसे ?

    उत्तर देंहटाएं
  9. जंगल में राजशाही की हो रही फज़ीहत,
    हर ओर उल्लओं की, पंचायतें लगीं थी।

    बहुत सही....

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि आज दिनांक 03-09-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-991 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  11. बेहतरीन ,बेहतरीन, बेहतरीन ....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  12. लाजवाब !
    वैसे पंचायत मैने नहीं बुलवाई थी
    मेरे अखबार में खबर भी नहीं आई थी !

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails