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शनिवार, 22 सितंबर 2012

"थोड़ा-थोड़ा पतंग उड़ाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


लाल और काले रंग वाली,
मेरी पतंग बड़ी मतवाली।

मैं जब विद्यालय से आता,
खाना खा झट छत पर जाता।
पतंग उड़ाना मुझको भाता,
बड़े चाव से पेंच लड़ाता।

पापा-मम्मी मुझे रोकते,
बात-बात पर मुझे टोकते।

लेकिन मैं था नही मानता,
इसका नही परिणाम जानता।

वही हुआ था, जिसका डर था,
अब मैं काँप रहा थर-थर था।

लेकिन मैं था ऐसा हीरो,
सब विषयों लाया जीरो।

अब नही खेलूँगा यह खेल,
कभी नही हूँगा मैं फेल।

आसमान में उड़ने वाली,
जो करती थी सैर निराली।

मैंने उसे फाड़ डाला है,
छत पर लगा दिया ताला है।

मित्रों! मेरी बात मान लो,
अपने मन में आज ठान लो।

पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।
थोड़ा-थोड़ा पतंग उड़ाओ।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।
    थोड़ा-थोड़ा पतंग उड़ाओ।।
    बहुत सुन्दर ज्ञानवर्धक बाल रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया पतंगबाजी |
    आभार गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. पुस्तक लेकर ज्ञान बढ़ाओ।
    थोड़ा-थोड़ा पतंग उड़ाओ।।
    sarthak kavita ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर ज्ञानवर्धक बाल रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. खूबसूरत बाल कविता ज्ञान देती हुई प्रस्तुति :)))

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर और शिक्षाप्रद बालगीत...

    उत्तर देंहटाएं
  7. कविता में प्रयुक्त वर्णन तो अच्छा लगा, पर शास्त्री जी अपने रंग में नहीं दिखे।

    उत्तर देंहटाएं
  8. hawa mein uddtee sundar patang guru jee...maine socha thaa ki aap prachi aur pranjal ki photo lagayenge....

    उत्तर देंहटाएं

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