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रविवार, 16 सितंबर 2012

"सन्तों की वाणी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ये हमारी तरह है सरल औ' सुगम,
सारे संसार में इसका सानी नहीं।

जो लिखा है उसी को पढ़ो मित्रवर,
बोलने में कहीं बेईमानी नहीं।

BUT व PUT का नहीं भेद इसमें भरा,
धाँधली की कहीं भी निशानी नहीं।

व्याकरण में भरा पूर्ण विज्ञान है,
जोड़ औतोड़ की कुछ कहानी नहीं।

सन्धि नियमों में पूरी उतरती खरी,
मातृभाषा हमारी बिरानी नहीं।

मेरे भारत की भाषाएँ फूलें-फलें,
हमको सन्तों की वाणी भुलानी नहीं।

"रूप" इसका सँवारें सकल विश्व में,
रुकने पाए हमारी रवानी नहीं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी भाषा सदियों से संजोयी है..आँखों का तारा बन कर रहेगी..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर |
    हमारी भाषा भले ही अधिक प्रचलन में ना रही हों पर हमारे साहित्य और संस्कृति में सदियों से है और रहेगी|

    सादर नमन |
    नई कविता-"बेहिसाब याद आती है,माँ..!"
    आभार..|

    उत्तर देंहटाएं
  3. सही है ..:)
    मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. देवभाषा से उत्पन्न हिंदी भाषा सदियों से चली आ रही है और सदियों तक चलती रहेगी. इसका कोई और विकल्प नहीं बन सकता है.
    --

    उत्तर देंहटाएं
  5. हिंदी भाषा अमर और अमिट है..
    सबसे सरल .सबसे सीधी ..
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह!
    आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को आज दिनांक 17-09-2012 को ट्रैफिक सिग्नल सी ज़िन्दगी : सोमवारीय चर्चामंच-1005 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  7. हिंदी बन ललाट की बिन्दी बना रही भू को सुहागिनि ।

    उत्तर देंहटाएं

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