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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

"प्रीत पोशाक नयी लायी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज पेश कर रहा हूँ
अपनी शायरी के शुरूआती दिनों की
एक बहुत पुरानी ग़ज़ल!
Parrot Bird Gallery, Rare Bird
हमने सूरत ही ऐसी पायी है।
उनको ऐसी अदा ही भाई है।।

दिल किसी काम में नही लगता,
याद जब से तुम्हारी आयी है।

घाव रिसने लगें हैं सीने के,
पीर चेहरे पे उभर आयी है।

साँस आती है, धडकनें गुम है,
क्यों मेरी जान पे बन आयी है।

गीत-संगीत बेसुरा सा है,
मन में बंशी की धुन समायी है।

मेरी सज-धज हैं, बेनतीजा सब,
प्रीत पोशाक नयी लायी है।

होठ हैं बन्द, लब्ज गायब हैं,
राज की बात है, छिपायी है।

चाहे कितनी बचा नजर मुझसे,
इश्क की गन्ध छुप न पायी है।

रूप से पेट तो नहीं भरता,
ऐसी हमने ख़ुराक खायी है।

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत - बहुत सुन्दर
    बेहतरीन रचना.....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ग़ज़ल दाद कबूल करें

    उत्तर देंहटाएं
  3. "होठ हैं बन्द, लब्ज गायब हैं,
    राज की बात है, छिपायी है।" बहुत ही उम्दा और दिलकश गज़ल |

    सादर |

    उत्तर देंहटाएं


  4. चाहे कितनी बचा नजर मुझसे,
    इश्क की गन्ध छुप न पायी है।

    बढ़िया अश आर है क्या मतला क्या मक्ता .

    दास्तानें इश्क का अब क्या कहिये ,

    ये आग बहुत हरजाई है .

    किसी के बुझाए कब बूझ पाई है .

    उत्तर देंहटाएं


  5. चाहे कितनी बचा नजर मुझसे,
    इश्क की गन्ध छुप न पायी है।

    बढ़िया अश आर है क्या मतला क्या मक्ता .

    दास्तानें इश्क का अब क्या कहिये ,

    ये आग बहुत हरजाई है .

    किसी के बुझाए कब बुझ पाई है .

    अल्लाह दुहाई है दुहाई है .

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर बेहतरीन रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढ़िया गजल |
    आभार गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक अच्छी ग़ज़ल है पढ़वाई,
    शुक्रिया आभार औ' बधाई है।

    उत्तर देंहटाएं

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