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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

"धरती को खुशहाल बनाओ" बालकविता (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बारिश का हो गया सफाया।
आसमान में कुहरा छाया।।

जब खेतों में गया घूमने।
छटा देख मन लगा झूमने।।

लदे हुए बिरुओं पर गहने।
झूमर से धानों ने पहने।।
 
कुछ शाखाओं पर हरियाली।
कुछ सोने जैसे रंग वाली।।

सोंधी-सोंधी महक सुहाती।
मन में खुशियाँ बहुत जगाती।।
 
तितली उड़ती पंख हिलाती।
अपना सुन्दर रूप दिखाती।।

फसलों के कुछ बैरी टिड्डे।
हरियाली में छिपकर बैठे।।
 
देख रहे थे टुकर-टुकरकर।
पौधे खाते कुतर-कुतरकर।।

इनके भी तो कुछ दुश्मन हैं।
जो इनका खा जाते तन हैं।।
 
जब सूरज नभ में छा जाता।
कौओं का दल इन्हें मिटाता।।

फसल उगाना जिम्मेदारी।
करो खेत की पहरेदारी।।

पौध लगाओ, अन्न उगाओ।
धरती को खुशहाल बनाओ।।


17 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर संदेश देती बढ़िया बाल कविता .

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर रंगविरंगा बाल गीत.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अनुपम शब्‍दों का संगम इस बालगीत में ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर बालगीत...
    सुन्दर
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. फसलों के कुछ बैरी टिड्डे।
    हरियाली में छिपकर बैठे।।

    देख रहे थे टुकर-टुकरकर।
    पौधे खाते कुतर-कुतरकर।।
    बहुत सजीव चित्र खेती ओर खलिहान का ,प्रकृति के विधान का ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. रोचक कृति...बहुत खूब |

    सादर नमन |

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर सचित्र बाल कविता अच्छी सीख देती हुई बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी कविता सुखद हर्ष देती है.
    हार्दिक आभार,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं

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