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बुधवार, 19 सितंबर 2012

"साबुन से धोया हमने गधों को हजार बार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों! उत्तराखण्ड में भारी बारिश के चलते दो दिनों से हमारे शहर में बिजली नहीं थी। आज पाँच दिन में मौसम खुल गया है। और मैं अपनी एक पुरानी रचना आपके साथ साझा कर रहा हूँ!

हमने बनाए जिन्दगी में कुछ उसूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

हमने तो पड़ोसी को अभय-दान दिया है,
दुश्मन को दोस्त जैसा सदा मान दिया है,
बस हमसे बार-बार हुई ये ही भूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

साबुन से धोया हमने गधों को हजार बार,
लेकिन कभी न आया उनमें गाय सा निखार,
क्यों पथ में बार-बार बिछाते वो शूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

हम जोर-जुल्म के कभी आगे न झुकेंगे,
जल-जलों तूफान से डर कर न रुकेंगे,
खारों को हमने मान लिया सिर्फ फूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. साबुन से धोया हमने गधों को हजार बार,
    लेकिन कभी न आया उनमें गाय सा निखार,

    बहुत खूब !कितना ही नहलाओ, चाहे कितने ही सफ़ेद कपडे पहने फिर भी बदबू आती है इन गधों से !

    उत्तर देंहटाएं
  2. हमने तो पड़ोसी को अभय-दान दिया है,
    दुश्मन को दोस्त जैसा सदा मान दिया है,
    बस हमसे बार-बार हुई ये ही भूल है।
    गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

    उत्तर देंहटाएं
  3. गजब ||

    सुन्दर प्रस्तुती |
    बढ़िया भाव ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. हमको मालूम है साबुन से कुछ नहीं होता
    होता तो अब तक हम भी सुधर चुके होते !

    उत्तर देंहटाएं

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