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सोमवार, 10 सितंबर 2012

"हमारी नियति" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वो
सबके साथ रहता था
हमारी सुनता था
अपनी कहता था
किन्तु
जब से हुआ है मशहूर
हो गया है सबसे दूर
अब न रहा वो
सीधा-सादा बन्दा है
क्योंकि
वो जनता का नुमाइन्दा है
पहले था मानव
फिर हुआ अतिमानव
किन्तु अब है महामानव
तन से देशी
मन से सरकारी
यही तो है
उसकी लाचारी
तीन टाँग की कुर्सी
चढ़ा देती है
अर्श पर
लुढ़क जाये तो
पटक देती है
फर्श पर
रूप राजशाही
नाम लोकशाही
जनता के द्वारा
जनता का कानून
भ्रष्टाचार
लोकतन्त्र का जुनून
दुर्गति ही दुर्गति
यही तो है
हमारी नियति!

20 टिप्‍पणियां:

  1. नीति-नियत पर दृष्टि है, रहा नियंता देख |
    चन्द्रगुप्त की लेखनी, प्रभु जांचे आलेख |
    प्रभु जांचे आलेख, जँचे न इनकी करनी |
    उड़े हवा में ढेर, समय पर सकल बिखरनी |
    अपनों को यदि भूल, छलेगा अपना रविकर |
    पायेगा वह दंड, भरोसा नीति नियत पर ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. मयंक जी सुन्दर अभिव्यक्ति ....................... तीन टाँग की कुर्सी
    चढ़ा देती है
    अर्श पर
    लुढ़क जाये तो
    पटक देती है
    फर्श पर
    रूप राजशाही
    नाम लोकशाही
    जनता के द्वारा
    जनता का कानून
    भ्रष्टाचार

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सटीक और बढ़िया..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  4. भ्रष्टाचार
    लोकतन्त्र का जुनून
    दुर्गति ही दुर्गति
    यही तो है
    हमारी नियति,,,,,शानदार अभिव्यक्ति

    RECENT POST - मेरे सपनो का भारत

    उत्तर देंहटाएं
  5. "दुर्गति ही दुर्गति
    यही तो है
    हमारी नियति!"

    एक कड़वा सच...|सार्थक रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  6. सबको समय का राग सुनना है, अपने हिस्से का।

    उत्तर देंहटाएं
  7. क्या खूब है इस नियति का खेल भी ...कब करवट बदल दे ...कोई नहीं जनता ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार ११/९/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  9. जहां जनता के द्वारा ,जनता के लिए ,जनता की ऐसी की तैसी होती है,डेमोक्रेसी ऐसी होती है .
    रूप राजशाही
    नाम लोकशाही
    जनता के द्वारा
    जनता का कानून
    भ्रष्टाचार
    लोकतन्त्र का जुनून
    दुर्गति ही दुर्गति
    यही तो है
    हमारी नियति!
    ram ram bhai
    सोमवार, 10 सितम्बर 2012
    आलमी हो गई है रहीमा शेख की तपेदिक व्यथा -कथा (आखिरी से पहली किस्त )


    उत्तर देंहटाएं
  10. यही लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों का सत्य है. इसको बदलने के बारे में सोचा जाय तो कुछ हो सकता है लेकिन इसके लिए अपने अपने इलाके में एक नहीं कई अन्ना खड़े करने होंगे. सत्ता से दूर लेकिन लोक को बांध कर अनाचार के खिलाफ खड़ा करने के लिए एक सन्मति देने के लिए जरूरी है और तभी इस रवैये में परिवर्तन भी जरूरी है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. बिल्कुल सही चित्रण किया है।

    उत्तर देंहटाएं

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