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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

"दोहे-बदल रहे परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबसे अच्छा विश्व में, अपना भारत देश।
नैसर्गिक अनुभाव के, सजे यहाँ परिवेश।१।

कामुकता-अश्लीलता, बढ़ती जग में आज।
इसके ही कारण हुआ, दूषित देश समाज।२।

ढोंग-दिखावा दिवस हैं, पश्चिम के सब वार।
रोज बदलते है जहाँ, सबके ही दिलदार।३।

एक दिवस की प्रतिज्ञा, एक दिवस का प्यार।
एक दिवस का चूमना, पश्चिम के किरदार।४।

प्रतिदिन करते क्यों नहीं, प्रेम-प्रीत-व्यवहार।
एक दिवस के लिए क्योंचुम्बन का व्यापार।५।

15 टिप्‍पणियां:

  1. कामुकता-अश्लीलता, बढ़ती जग में आज।
    इसके ही कारण हुआ, दूषित देश समाज ...

    सामयिक ... सार्थक दोहे ... आज को प्रतिबिंबित करते ...

    उत्तर देंहटाएं

  2. प्रतिदिन करते क्यों नहीं, प्रेम-प्रीत-व्यवहार।
    एक दिवस के लिए क्यों, चुम्बन का व्यापार।५।

    सार्थक दोहे

    उत्तर देंहटाएं
  3. मान्यवर आपने बहुत अच्छी बातें कही है !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया दोहे -
    आभार गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  5. ढोंग-दिखावा दिवस हैं, पश्चिम के सब वार।
    रोज बदलते है जहाँ, सबके ही दिलदार।३।
    बहुत सटीक बातें कही :)

    उत्तर देंहटाएं
  6. वर्तमान मानसिकता पर सटीक टिप्पणी!

    उत्तर देंहटाएं
  7. अपने यहाँ भी अश्लीलता बढती ही जा रही है,बहुत ज्ञानवर्धक संदेश।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (13-02-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

    उत्तर देंहटाएं
  9. जब मानसिकता ही दूषित हो जाय तो यही होता है!

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर प्रभाब शाली अभिब्यक्ति .आभार .


    आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहे
    बो सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर है

    आज के हालत में किस किस से हम बचकर चले
    प्रशं लगता है सरल पर ये बहुत गंभीर है

    उत्तर देंहटाएं

  11. प्रेम दिवस मुबारक .मान्यवर बहुत सुन्दर दोहावली है .बस एक ही गुजारिश पहले पूरब के गिरेबान में झांकें फिर कोसें पश्चिम को .रोज़ यहाँ किरदार बदलते ,पूरब पश्चिम ,पश्चिम पूरब .

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही सटीक व् सार्थक रचना
    शास्त्री जी आभार ..........

    उत्तर देंहटाएं

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