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शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

"ग़ज़ल-खो चुके सब कुछ" (डॉ,रूपचन्द्र शास्स्त्री 'मयंक')

खो चुके सब, कुछ नहीं अब, शेष खोने के लिए।
कहाँ से लायें धरा, अब बीज बोने के लिए।।

सिर्फ चुल्लू में सिमटकर, रह गई गंगा यहाँ,
अब कहाँ जायें बताओ, पाप धोने के लिए।

पत्थरों के साथ रह कर, हो गये हैं संगे-दिल,
अब नहीं ज़ज़्बात बाकी, रुदन रोने के लिए।

पर्वतों से टूट कर, बहने लगे जब धार में,
चल पड़े हैं सफर पर, भगवान होने के लिए।

"रूप" को हमने तराशा, पारखी के वास्ते,
किन्तु कोई मिल न पाया, भार ढोने के लिए।

24 टिप्‍पणियां:

  1. पर्वतों से टूट कर, बहने लगे जब धार में,
    चल पड़े हैं सफर पर, भगवान होने के लिए।।
    सबसे धांसू शेर
    शुभकामनायें गुरुवर-

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्षमा सहित

      इस धरा में क्या धरा, कुछ सोच ऊंची कीजिये-

      आसमाँ में आज उड़िए, स्वागता है स्वागता है ।





      पाप धोने की जरुरत, आज रविकर क्या पड़ी ।

      पाप का यह घड़ा आखिर, सार्थक है योग्यता है ।

      हटाएं
  2. वाह जी वाह क्या बात कही है आप ने....सुन्दर अति सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन सर जी ,बदलती दुनिया एक मिशाले
    तहरीर है,रो रही है मातु गंगे,जो मुल्क की तक़दीर है**********^^^^^^^******** पर्वतों से टूट कर, बहने लगे जब धार में,
    चल पड़े हैं सफर पर, भगवान होने के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  5. दुचंदु चित अरु दुभाखें दुइ रसन रेतस रूप ।
    दुइ बरन सिरु रुधिर राखें नेता बन भुवन भूप ।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. शायद मैं बहुत छोटा हूं कोई भी टिप्पणी करने के लिए! अप्रतिम!
    http://voice-brijesh.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. पर्वतों से टूट कर, बहने लगे जब धार में,
    चल पड़े हैं सफर पर, भगवान होने के लिए।

    बेहद उम्दा पंक्तियाँ...बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  8. लूट गये सब, शेष नहीं कुछ

    सुन्दर कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार 10-फरवरी-13 को चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर रचना .........
    आभार!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. सिर्फ चुल्लू में सिमटकर, रह गई गंगा यहाँ,
    अब कहाँ जायें बताओ, पाप धोने के लिए।
    ,,,,बहुत उम्दा शेर

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर...

    उत्तर देंहटाएं
  12. sundar bhavpurn prastuti***ko samarpit ye panktiya ****"rang basanti ,sang basanti,jivan me ullas bhara ho,aanchal me sarso fule,aakho me madhumas chupa ho....."

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुंदर बेहतरीन प्रस्तुति हेतु बधाई आपको

    उत्तर देंहटाएं
  14. सिर्फ चुल्लू में सिमटकर, रह गई गंगा यहाँ,
    अब कहाँ जायें बताओ, पाप धोने के लिए...बहुत गहरी बात कही आपने

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं

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