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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

"मजबूरी का नाम गांधी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आजादी को 
छः दशक 
बीत गये 
मगर अब भी 
गांधी जिन्दा हैं
हमारे देश में...! 
कोई बनता है गांधी
शौक से..
और कोई बनता है 
मजबूरी में...!
--
कोई पहनता है चप्पल 
मुलायम चमड़े की ...
और कोई पहनता है 
प्लास्टिक की 
खाली बोतलों में 
कत्तरों की 
पट्टी बनाकर ..! 
मेरे देश के.

यही तो हैं असली 
गांधी !
क्योंकि
मजबूरी का नाम
महात्मा गांधी!



15 टिप्‍पणियां:

  1. मर्मस्पर्शी..... जाने कब हालात बदलेंगें ?

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  2. आदरणीय गुरुदेव श्री प्रणाम वर्तमान परिस्थिति का सुन्दर वर्णन किया है आपने, बहुत ही मर्मस्पशी रचना है हार्दिक बधाई स्वीकारें इस शानदार रचना हेतु.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच्चा गांधी यही है बाकि सब मुखौटे में है.


    latest postअनुभूति : कुम्भ मेला

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. यही तो हैं असली
    गांधी !
    क्योंकि
    मजबूरी का नाम
    महात्मा गांधी!


    सच्ची तस्वीर उकेरी है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. दुख है कि लोगों ने गाँधी को भी सीमित कर दिया है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. यही तो हैं असली
    गांधी !
    क्योंकि
    मजबूरी का नाम
    महात्मा गांधी!


    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  8. सच्चा गांधी कोई नहीं बनता है सब बनतें हैं मज़बूरी में इसीलिए तो कहा जाता मज़बूरी का नाम गांधी ...............
    मार्मिक रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut khoob likha hai aur chitr bhi bahut kamal hai.........

    उत्तर देंहटाएं
  10. जो मजबूर है उनकी किसी को फ़िक्र ही नहीं है।

    उत्तर देंहटाएं

  11. बढ़िया प्रस्तुति .अर्थ व्यवस्था का विद्रूप उजागर करती हुई .

    उत्तर देंहटाएं

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