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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

"हमीं पर वार करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी एक पुरानी ग़ज़ल

हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।

हमारी आग में तपकर, कभी पिघलेंगे पत्थर भी,
पहाड़ों के शहर में हम, चमन गुलज़ार करते हैं।

कहीं हैं बर्फ के जंगल, कहीं ज्वालामुखी भी हैं,
कभी रंज-ओ-अलम का हम, नहीं इज़हार करते हैं।

अकीदा है, छिपा होगा कोई भगवान पत्थर में,
इसी उम्मीद में हम, रोज ही बेगार करते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
तराशा है जिसे रब ने, उसे स्वीकार करते हैं।

13 टिप्‍पणियां:

  1. हकीकत का आइना दिखलाना तो कोई आपसे सीखे .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर , यही कहूंगा कि ऐसा जो करते है वो गद्दार करते है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
    नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।
    बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ...

    आप भी पधारें
    ये रिश्ते ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
    जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।---गद्दार इसीको कहते हैं
    latest post मोहन कुछ तो बोलो!

    latest postक्षणिकाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
    नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं..

    प्यार में बर्दाश तो किया ही जाता है ... प्रेम उसी का मान है ...
    ख्पूब्सूरत गज़ल है शास्त्री जी ... नमस्कार ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. तराशा है जिसे रब ने उसे स्वीकार करते हैं वाह क्या बात है शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर प्रस्तुति श्रीमान जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. काश इनको भान होता,
    देश के प्रति मान होता।

    उत्तर देंहटाएं

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