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वो मुकद्दर आजमाना चाहता है
चाँद-तारों को बुलाना चाहता है
बिना मेहनत और मशक्कत के यहाँ
वो लुटी जागीर पाना चाहता है
लौ जलाई थी बुजुर्गों ने कभी जो
आज वो शम्मा बुझाना चाहता है
चाटकर जूठन विदेशी थालियों की
वो सिकन्दर अब कहाना चाहता है
सिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन
देश की बिगड़ी बनाना चाहता है
सिर्फ पन्नों को गिना है आज तक
और वो फ़ाज़िल कहाना चाहता है
“रूप” में पागल हुआ वो इस कदर
अपनी हस्ती को मिटाना चाहता है
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चाटकर जूठन विदेशी थालियों की
जवाब देंहटाएंवो सिकन्दर अब कहाना चाहता है
सिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन
देश की बिगड़ी बनाना चाहता है
.....सच आज देश में अपनी छोड़ देश की बिगड़ी बनाने वालों की कोई कमी नहीं
बहुत बढ़िया सार्थक गजल
बहुत बढ़िया..आभार.
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर रचना, काश लोग समझ पाते कि वे क्या करना चाहते हैं।
जवाब देंहटाएंयह सबको समझ आये, यही कामना करते हैं.
जवाब देंहटाएंवाह...बहुत खूब...।
जवाब देंहटाएंबढ़िया ग़ज़ल लिखी है आपने...।
जवाब देंहटाएंसिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन
देश की बिगड़ी बनाना चाहता है----
बहुत सार्थक और सटीक बात कही है
वाह बहुत खूब प्रस्तुति
आग्रह है पढें
तपती गरमी जेठ मास में---
http://jyoti-khare.blogspot.in
beshk ak behatareen gazal
जवाब देंहटाएंलौ जलाई थी बुजुर्गों ने कभी जो
जवाब देंहटाएंआज वो शम्मा बुझाना चाहता है sacchi bat ....
बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय......
जवाब देंहटाएंवाह वाह लाजवाब प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंलाजवाब ..
जवाब देंहटाएंगुरु जी प्रणाम
बेहतरीन प्रस्तुति धन्यवाद !!
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