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गुरुवार, 7 जनवरी 2010

“कुछ छन्द” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

खार छाँटे, खार काटें, खार भूतल से हटायें।
प्यार बोएँ, प्यार बाँटें, प्यार के पौधे उगायें।
भूलकर मत-भेद सारे लोग मिल-जुलकर रहें,
रौशनी के दीप लेकर हम धरा को जगमगायें।।
बात हो मत भेद की तो ठीक है.
पर नही मन-भेद होना चाहिए।
ज्ञान की गंगा बहे तो ठीक है,
गल्तियों पर खेद होना चाहिए।।
राम जग में रम रहा है,
राम ही रहमान है।
चार दिन की जिन्दगी है,
सब यहाँ मेहमान हैं।।
दर्द-ओ-गम में जी रहा है आदमी,
बस कलेवर सी रहा है आदमी।
हँसी के बदले खुशी मिलती नही,
वेदना को पी रहा है आदमी।

15 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द-ओ-गम में जी रहा है आदमी,
    बस कलेवर सी रहा है आदमी।
    हँसी के बदले खुशी मिलती नही,
    वेदना को पी रहा है आदमी।
    bahut khoob !

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर शब्दों के साथ बहुत सुंदर रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. हर हर्फ लाजवाब है। जैसे फुलों में गुलाब है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बात हो मत भेद की तो ठीक है.
    पर नही मन-भेद होना चाहिए।
    ज्ञान की गंगा बहे तो ठीक है,
    गल्तियों पर खेद होना चाहिए।
    मयंक जी बहुत सुन्दर रचना है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. बात हो मत भेद की तो ठीक है.
    पर नही मन-भेद होना चाहिए।
    बहुत सुंदर बात कही आपने. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. बात हो मत भेद की तो ठीक है.
    पर नही मन-भेद होना चाहिए।
    ज्ञान की गंगा बहे तो ठीक है,
    गल्तियों पर खेद होना चाहिए।।

    बहुत अच्छी कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्रीजी,
    'मतभेद' और 'मन-भेद' की अच्छी कही आपने ! गलतियों पर खेद-प्रकाश की सीख भी बड़ी मासूम इल्तिजा है ! सीधे-सच्चे छंदों में नई पीढ़ी को सुन्दर और प्रभावी सीख दे रहे हैं आप ! साधुवाद !!
    सादर-- आनंद.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर सुंदर सार्थक संदेशों के साथ बेहतरीन छ्न्द प्रस्तुति...आभार शास्त्री जी!!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर
    आप की रचना हमेशा अच्छी होती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  10. प्यार बांटे...खार छांटे ...
    चार दिन की जिंदगी में क्यों पीये वेदना का जहर
    खुश रहे ...खुशियाँ बांटे ...
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. मन भेद नही होना चाहिए
    सही कहा आपने।

    उत्तर देंहटाएं

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