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बुधवार, 13 जनवरी 2010

“गजल के उदगार ढो रहे हैं।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"चुरा लीजिए नटवरलाल!
लाया हूँ मैं ताजा माल!!"

ऊसर जमीन में हम, उपहार बो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
बन कर सजग सिपाही, हम दे रहे हैं पहरे,
हम मेट देंगे अपने, पर्वत के दाग गहरे,
उनको जगा रहे हैं, जो हार सो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
हम प्रीत के सुजल से, अंगार धो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
मनके सभी पिरोये, टूठे सुजन मिलाये.
वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
    फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
    हम प्रीत के सुजल से, अंगार धो रहे हैं।
    हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
    बहुत सुंदर कविता शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत लाजवाब शाश्त्रीजी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
    माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।

    nice

    उत्तर देंहटाएं
  4. ऊसर जमीन में हम, उपहार बो रहे हैं।
    हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

    बहुत खूब शास्त्रीजी...

    उत्तर देंहटाएं
  5. गज़ल का हर शेर बहुत अच्छा है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मनके सभी पिरोये, टूठे सुजन मिलाये.
    वीरान वाटिका में, रूठे सुमन खिलाये,
    माला के तार में हम, अब प्यार पो रहे हैं।
    हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।

    वाह,
    शास्त्री जी आपको कविता के नीचे एक चेतावनी मदन लाल जी के नाम भी लिख देनी थी कि भाई अब मत चोरना इसे :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. शानदार रचना ,अपने उदगारों को ऐसे ही प्रस्तुत करते रहिये

    उत्तर देंहटाएं
  8. गोदियाल जी!
    मदन लाल को
    आमन्त्रण दे दिया है!

    उत्तर देंहटाएं
  9. shastriji

    bahut hi shandar rachna hai aur choron ke moonh par bhi achcha nishana lagaya hai.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत बढिया लिखा है .. बहुत बहुत बधाई आपको !!

    उत्तर देंहटाएं
  11. एक तरफ ख़ुशी की बात यहाँ यह है की आपकी रचना इतनी उम्दा लगी पारीक जी को की बिना किसी लोक लाज के आपकी रचना को अपनी बना ली !!! ये है सच्ची रचना मोहब्बत अब आप चोर कहें चाहे डाकू कहे हा..हा..हा..

    उत्तर देंहटाएं
  12. ये मदनलाल कौन है इनसे बचकर रहना होगा ?

    उत्तर देंहटाएं
  13. @Sharad Kokaas
    ये मदनलाल कौन है इनसे बचकर रहना होगा ?

    शरद जी, नटवरलाल का सौतेला भाई :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. मयंक जी आपकी रचना अद्भुत है।
    तूफान आँधियों में, हमने दिये जलाये,
    फानूस बन गये हम, जब दीप झिलमिलाये,
    हम प्रीत के सुजल से, अंगार धो रहे हैं।
    हम गीत और गजल के उदगार ढो रहे हैं।।
    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है। आपने उस रचना चोर को पकड कर बहुत बडा काम किया है मैने कल उसकी बहुत सी पोस्ट देखी । उसे तो पोस्ट करना भी नहीं आता उसने ऐसे ही उठा उठा कर चेप दी हैं एक पहरे मे तीन तीन गज़लें । अच्छा चोर पकडा बधाई आपको

    उत्तर देंहटाएं
  15. आज तो आपने पहले ही न्यौता दे दिया. मदन जी को ;)

    उत्तर देंहटाएं
  16. क्या बात है। बहुत ही बढ़िया कहा- उद्‍गार ढो रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  17. आदरणीय शास्त्री जी, आपको मकर संक्रांति पर्व पर शुभकामनाएँ और प्रणाम।

    उत्तर देंहटाएं
  18. BAHUT LAJAWAAB SHASHTRI JI .... BEHATREEN RACHNA AUR SAATH SAATH MADAN LAAL KO SAHI CHETAAWNI ...

    उत्तर देंहटाएं

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