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सोमवार, 18 जनवरी 2010

“बूढ़ा हो रहा बचपन है?” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कुहासे की सफेद चादर
मौसम ने ओढ़ ली
ठिठुरन से मित्रता
भास्कर ने जोड़़ ली
निर्धनता
खोज रही है
आग के अलाव
किन्तु
लकड़ियों के
ऊँचे हैं भाव
ठण्ड से काँप रहा है
कोमल तन
कूड़े में से पन्नियाँ
बीन रहा है बचपन
इसके बाद
वो इन्हें
बाजार में बेचेगा
फिर जंगल में जाकर
लकड़िया बीनेगा
तब कहीं
उसके घर में
चूल्हा जलेगा
पेट की आग तो
बुझ जायेगी
मगर बदन तो
ठण्डा ही रहेगा
थोड़े दिन में
कुहरा छँट जायेगा
सूरज अपने
असली रूप में आयेगा
फिर छायेगी
होली की मस्ती
दिन मे आयेगी
तन में सुस्ती
सर्दी में कम्पन
गर्मी में पसीना
सहना मजबूरी है
क्योंकि
दाल-रोटी का
जुगाड़ भी तो
जरूरी है
क्या इसी का नाम जीवन है?
क्या बूढ़ा हो रहा बचपन है?

10 टिप्‍पणियां:

  1. आज कुछ ऐसा है ग़रीबी है की जाने की नाम नही लेती माँ-बाप की ज़िम्मेदारी बच्चे खुद अपने कंधों पर धो रहे है..और बस इसी जद्दोजहद में उनका बचपन कब आता है और कब चला जाता है पता ही नही चलता..

    एक सुंदर भाव व्यक्त करती हुई सामाजिक कविता..बधाई हो!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह जीवन है ।इस जीवन का यही है रंग - रूप !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो लोग इन स्थितियों के लिए ज़िम्मेदार है उन्हे इस बात की कोई फिक्र नही है । सार्थक रचना है यह ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” जी नमस्कार
    आपकी रचना
    “बूढ़ा हो रहा बचपन है?”
    पढ़ी एक दम सत्य के धरातल पर लिखी रचना बेहद हृदय स्पर्शी है.
    वो पंकितियाँ जो मुझे सबसे अच्छी लगीं:-
    सर्दी में कम्पन
    गर्मी में पसीना
    सहना मजबूरी है
    क्योंकि
    दाल-रोटी का
    जुगाड़ भी तो
    जरूरी है

    मन को झंकृत करने वाली रचना के लिए बधाई.
    - विजय तिवारी 'किसलय'

    उत्तर देंहटाएं
  5. lajawaab kavita .......zindagi ki sachchaiyon ko udhedti huyi .........kitni saralta se hakikat bayan kar di.

    उत्तर देंहटाएं

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