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रविवार, 24 जनवरी 2010

“… …सूरज ने मुँहकी खाई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सूरज और कुहरा


15012010056


कुहरे और सूरज में,जमकर हुई लड़ाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता,


लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता,


बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा,


कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,


निर्धन की ठिठुरन से होती हाड़-कँपाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।



कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,


ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,


सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।


जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,
    ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,
    बहुत अच्छी रचना, लेकिन सुना है आज तो सुर्य देवता जीत गये

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,


    ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,


    सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।


    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

    bahut sunder samyik, aur pyara geet, badhaai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! इस उम्दा रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आप इतना अच्छा लिखते कैसे हैं. अन्त की लाईनों ने बड़ा ही हृदयविदारक चित्र खींच दिया. महफूज जी आज कुछ व्यथित हैं, उनके लिये भी एक अच्छी सी रचना भेजिये.

    उत्तर देंहटाएं
  6. " कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,
    ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,
    सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।
    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

    " bahut hi badhiya rachana ."

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    उत्तर देंहटाएं
  7. @भारतीय नागरिक जी!
    महफूज के लिए अनमोल तोहफा तो आज "चर्चा मंच" http://charchamanch.blogspot.com/2010/01/blog-post_25.html पर सजा दिया है!

    उत्तर देंहटाएं
  8. ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता,
    लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता,
    बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।
    जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

    बहुत सुन्दर , सभी कुछ विपरीत दिशा में च;ल रहा है शास्त्री जी ,

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत ही सुन्‍दर भावों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा,
    कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,....

    मौसम की भी शब्दों में बाँध लिया आपने शास्त्री जी ......... कमाल की रचना है .......

    उत्तर देंहटाएं

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