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रविवार, 17 जनवरी 2010

“विदेश-यात्रा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज अचानक
बन गया एक संयोग
घर में आ गये
कुछ परिचित लोग
विदेश-यात्रा का
बन गया कार्यक्रम
कार में बैठ गये
उनके साथ हम
कुछ रुपये
जेब में लिए डाल
आनन-फानन में
पहुँच गये नेपाल
सामने दिखाई दिया
एक शहर
नाम था उसका
महेन्द्रनगर
वहाँ बहुत थे
आलीशान मकान
एक खोके में थी
चाय की दुकान
दुकान में
अजीब नजारा था
रंगीन बोतलों का
शरारा था
गर्म चाय थी
लिबासों में
ठण्डी चाय थी
गिलासों में
हर दूकान पर थी
एक बाला
उडेल रही थी
रूप की हाला
यह देखकर
मन में हुआ मलाल
और अपने देश का
आया ख्याल
पश्चिम की
होड़ में
सभ्यता की
दौड़ में
हम भले ही
पिछड़े हैं
लेकिन चरित्र में
हम आज भी
अगड़े हैं।

19 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ ऐसा ही है आज कल ..बहुत बढ़िया रचना..धन्यवाद!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह्! यात्रा संस्मरण का ये अन्दाज भी खूब रहा....

    उत्तर देंहटाएं
  3. डाक्टसा,
    आनंद ला दिया आपकी इस विदेश यात्रा ने। हम जब खटीमा आएंगे तब ज़रूर महेन्द्र नगर जाना चाहेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कितना दूर है महेन्द्र नगर आपके यहाँ से?

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी,
    विदेश की ये शार्ट यात्रा बढ़िया रही...सुना है प्रचंड ने सीमावर्ती इलाकों में भारत के ख़िलाफ़ प्रचंड विषगमन अभियान छेड़ रखा है...

    जय हिंद...

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  6. भाई समीर लाल जी!
    25 किमी दूर है हमारे घर खटीमा से नेपाल का यह शहर
    महेन्द्रनगर!

    उत्तर देंहटाएं
  7. sahi baat kahi aapne..hamara desh charitr ke mamle mein nihsandeh aage hain...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर शास्त्री जी, वैसे एक बात कहूँ , विदेश में आप शायद रास्ता भटक गए थे :)

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  9. nepaal kaa haal!!!jaakar apne desh ka khyaal !! sundar mishaal!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. भौतिकता की अंधी दौड़ ने क्या कर दिया!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर.... हमारे गोरखपुर से भी नेपाल बहुत पास है.... पहले हम लोग मोटर साईकिल से ही चले जाते थे..... उस वक़्त भी बालाएं चाय परोसतीं थीं..... बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट....

    उत्तर देंहटाएं
  12. बढिया, भारत में जो कुछ है चरित्र ही तो है, जिसे लोग अब समाप्‍त कर देना चाहते हैं। अच्‍छा चिन्‍तन बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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