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सोमवार, 11 जनवरी 2010

“ठहर गया जन-जीवन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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कुहरे की फुहार से
ठहर गया जन-जीवन
शीत की मार से
काँप रहा मन और तन
माता जी लेटी हैं
ओढ़कर रजाई
काका ने तसले में
लकड़ियाँ सुलगाई
गलियाँ हैं सूनी
सड़कें वीरान हैं
टोपों से ढके हुए
लोगों के कान हैं
खाने में खिचड़ी
मटर का पुलाव है
जगह-जगह जल रहे
आग के अलाव है
राजनीतिक भिक्षुओं के
भरे हुए पेट हैं
जमाखोरी करके लोग
बन गये सेठ हैं
विलम्बित उड़ाने हैं
ट्रेन सभी लेट हैं
ठण्डक से दिनचर्या
हुई मटियामेट है
मँहगाई की आग में
सेंकते रहो बदन
कुहरे की फुहार से
ठहर गया जन-जीवन

22 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल सर्दी सब पर भारी है। बीच - बीच में घना कोहरा भी घिर आता है। आज तो पूरे दिन कोहरा बूँद - बूँद कर बरसता रहा। फिर भी सब कुछ अपनी चाल चल रहा है।

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  2. उफ़ सर्दी में बुरा हाल है ...आपकी कविता ने थोड़ी रहत पहुंचाई...खुबसूरत अभिव्यक्ति सर !

    उत्तर देंहटाएं
  3. पंखों में हवा भरे बैठे पखेरू सब,
    बादल के स्वेटर पर टँका हुआ दिन!

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  4. शास्त्री जी,
    समय, काल और दशा का सुन्दर शब्द-चित्र ! सचमुच, ठहरा हुआ, ठिठका हुआ जीवन...
    साभिवादन--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सभी दिशाओं में बराबर फोकस किया आपने इस कोहरे और जाड़े के बहाने को लेकर..वैसे कविता बहुत बढ़िया लगी..यही सच भी है..धन्यवाद शास्त्री जी

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  6. सर्दी के जीवन का यथार्थ दर्शाती रचना..सुन्दर!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. thandi ke sathjeevan ki sabhi aavshktao ko bhut sundar dhang se prstut kiya hai aapne .

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  9. बहुत सर्दी है जी, लेकिनआप की इस रचना ने थोडी गर्मी दे दी बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  10. ठण्डक से दिनचर्या
    हुई मटियामेट है
    good!

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  11. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. समय व परिस्थितियों के बहुत ही अनुरूप कविता है।
    घुघूती बासूती

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  13. खूबसूरत चित्रांकन करते शब्द और अंत में महंगाई के सन्दर्भ ने नया आयाम जोड़ दिया है . उत्तम रचना !

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  14. waah waah............bahut hi sundar kavita likhi hai......sach yahi haal hai aajkal.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सर्दी और कोहरे के कारण घर ही सुरक्षित लगता है और घर में बैठकर बस कीजिए ब्‍लोगिंग और साथ में चाय और पकौडों का आनन्‍द लीजिए।

    उत्तर देंहटाएं
  16. मँह्गाई की आग में बदन तो क्या पूरा जिस्म पूरा दिल फुँक गया है.
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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