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मंगलवार, 19 जनवरी 2010

“वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा!” (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।
राह सुनसान थी, आगे बढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
धन के आगे कभी माथा टेका नही,
शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

भावनाओं में जीता रहा रात-दिन,
वेदनाओं को पीता रहा रात-दिन,
जिन्दगी की सलीबों पे चढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

मैंने हँसकर लिया, आपने जो दिया,
मैंने अमृत समझकर, गरल को पिया,
बेसुरी फूटी ढपली को मढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

कुछ ने सनकी कहा, कुछ ने पागल कहा,
कुछ ने छागल कहा, कुछ ने बादल कहा,
रीतियों और रिवाजों से लड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

आपने जो लिखाया, वही लिख दिया,
शब्द जो भी सुझाया, वही रख दिया,
मंजु-माला में कंकड़ ही जड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।
    वाह .. बहुत खूब !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. aapke upar to maa ki aseem anukampa hai ........bahut hi behtreen nagine jade huye hain is rachna mein..........kin shabdon mein tarif karoon shabd bhi kam pad rahe hain.ek bahut hi pak - saaf kavita...............badhayi.

    उत्तर देंहटाएं
  4. पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
    धन के आगे कभी माथा टेका नही,
    शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा।
    वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।
    अति सुन्दर, काश कि ये आज के मातहत भी इस बात से प्रेरणा ले पाते !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत प्रेरणादायक रचना.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अच्छा लिखा है , मंजुमाला में कंकड़ नहीं हीरे मोती ही जड़ता रहा , कहिये !

    उत्तर देंहटाएं
  7. पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
    धन के आगे कभी माथा टेका नही,
    शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा।
    वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।

    कितने सुन्‍दर शब्‍द मन को छूते चले गये, आभार इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. हम जैसे नए लेखको/कवियों को प्ररित करती सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  9. पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
    धन के आगे कभी माथा टेका नही,
    शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा...

    बहुत लाजवाब लिखा है शास्त्री जी ......... दिल में ज़ज़्बा रहने वाले कभी झुकते नही ........

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  11. शानदार रचना , ये जज्बा बना रहे

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर रचना. वसन्तपन्चमी की शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं

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