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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

“वरिष्ठ गणतन्त्र-दिवस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)



आज हमने मनाया
इकसठवाँ गणतन्त्र
फूँक दिया जन-मानस में
वरिष्ठता का मन्त्र
यह तन्त्र हो गया
सेवा निवृत्त
बाहर कर दिया
परिधि से वृत्त
नही कह पा रहे खुलकर
शब्द हो रहे मौन हैं
क्योंकि आज
बुजुर्ग की
मानता ही कौन है??
( चित्र गूगल सर्च से साभार)

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना है शास्त्री जी.
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच कह रहे हैं आप... आजकल बुजुर्गों की बात मानता ही कौन है?

    बहुत सुंदर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं तो मानने की कोशिश करता हूं. कई दफा कुछ मतभिन्नता भी हो जाती है. लेकिन अस्सी दफा तो मानता ही हूं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. शास्त्री जी,
    ज़रूर मानेंगे मगर पहले भारत का नक्शा ठीक कर दीजिये. आपके लगाए हुए इस नक़्शे में उत्तर भारत का काफी हिस्सा गायब है

    उत्तर देंहटाएं
  5. @Smart Indian - स्मार्ट इंडियन जी!
    गूगल सर्च से ही तो भारत के नक्शे लगाए हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर रचना, शास्त्री जी !बस यूँ समझिये की सठिया गया अपना गणतंत्र भी :)
    आपकी भी गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  7. गण्तन्त्र के माध्यम से आज का सच सही मै बुजुर्गों की कौन सुनता है धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह, पहले गरिष्ट था, अब वरिष्ठ है। :-)

    हां इस नक्शे पर बहुत आपत्ति है। आप अपनी पोस्ट लिख रहे हैं गूगल की नहीं!

    उत्तर देंहटाएं
  9. हटा दिया है जी सिर-कटा नक्शा!
    सुझाव के लिए आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  10. ठीक कहा आपने शास्त्रीजी आपने लेकिन भारत अब युवाओं का देश है ,देश के संचालन का कुछ प्रभार तो युवाओं को भी प्रदान करना चाहिए! बेहतरीन !

    उत्तर देंहटाएं

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