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रविवार, 10 जनवरी 2010

“अब बसन्त आयेगा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

खिल जायेंगे नव सुमन,

उपवन मुस्कायेगा!!


कुहासे की चादर,

धरा पर बिछी हुई।

नभ ने ढाँप ली है,

अमल-धवल रुई।।

दिवस हैं छोटे,

रोशनी मऩ्द है।

शीत की मार है,

विद्यालय बन्द है।।

जल रहे हैं अलाव,

आँगन चौराहों पर।

चहल-पहल कम है,

पगदण्डी-राहों पर।।

सूरज अदृश्य है,

पड़ रहा पाला है।।

पर्वत ने ओढ़ लिया,

बर्फ का दुशाला है।।

मन में एक आशा है,

अब बसन्त आयेगा!

खिल जायेंगे नव सुमन,

उपवन मुस्कायेगा!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बर्फ का दुशाला है।।
    मन में एक आशा है,
    sundar

    उत्तर देंहटाएं
  3. सर्दी की इतनी खूबसूरत तस्वीर सिर्फ शब्दों से. क्या बात है!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सूरज अदृश्य है,

    पड़ रहा पाला है।।

    पर्वत ने ओढ़ लिया,

    बर्फ का दुशाला है।।
    बहुत अच्छी कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बर्फ का दुशाला है।।
    मन में एक आशा है,
    अब बसन्त आयेगा!
    खिल जायेंगे नव सुमन,
    उपवन मुस्कायेगा ....

    शरद के बाद बसंत की चाह ......... बहुत ही सुंदर कविता है ..........

    उत्तर देंहटाएं
  6. मन में एक आशा है,
    अब बसन्त आयेगा!
    खिल जायेंगे नव सुमन,
    उपवन मुस्कायेगा!!

    शास्त्री जी, शब्दों का राज बहुत गहरा है,
    इसी उम्मीद पे तो अब दिल ठहरा है
    कि वसंत आयेगा... वसंत आयेगा !

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं

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