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मंगलवार, 6 जुलाई 2010

“..मौसम सुहाना हो गया है” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आज फिर एक पुरानी रचना!  

हाथ लेकर जब चले, तुम साथ में,
प्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है।

इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया,
दर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है।

जन्म-भर के, स्वप्न पूरे हो गये,
मीत सब अपना, जमाना हो गया है।

दिल के गुलशन में, बहारें छा गयीं,
अब चमन, मेरा ठिकाना हो गया है।

चश्म में इक नूर जैसा, आ गया,
बन्द अब आँसू , बहाना हो गया है।

तार मन-वीणा के, झंकृत हो गये,
सुर में सम्भव, गीत गाना हो गया है।

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्………………गज़ब का लिखा है और आज तो यहाँ सच मे मौसम सुहाना बना हुआ है और अभी जोरदार बारिश हो कर चुकी है ऐसे मे आपकी कविता ने तो सोने पे सुहागे का काम किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया मौसम बनाया है आपने, आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. hamesha chahta tha apaki post pe pehla comment karu.....
    kismat ka khel dekho aaj sab se pehle aana ho gaya hai!

    उत्तर देंहटाएं
  4. तार मन-वीणा के, झंकृत हो गये,
    सुर में सम्भव, गीत गाना हो गया है।
    शब्दों का अनूठा तारतम्य
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  5. तार मन-वीणा के, झंकृत हो गये,सुर में सम्भव, गीत गाना हो गया है।

    सुन्दर शब्द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. इन हालातों में वाकई में मौसम सुहाना ही होता है...

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुहाने मौसम का सुन्दर गीत !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. हाथ लेकर जब चले, तुम साथ में,
    प्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है।

    इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया,
    दर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है।
    वाह! वाह!!
    शास्त्री जी क्या बात है!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत स्दूंदर रचना .. प्रेम की मस्ती भारी है इसमे शास्त्री जी ..

    उत्तर देंहटाएं

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