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बुधवार, 14 जुलाई 2010

"जीवन की अभिव्यक्ति!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

 क्या शायर की भक्ति यही है? 
जीवन की अभिव्यक्ति यही है! 

शब्द कोई व्यापार नही है, 

तलवारों की धार नही है,
राजनीति परिवार नही है,
भाई-भाई में प्यार नही है,
क्या दुनिया की शक्ति यही है?

जीवन की अभिव्यक्ति यही है! 

निर्धन-निर्धन होता जाता, 

अपना आपा खोता जाता,
नैतिकता परवान चढ़ाकर,
बन बैठा धनवान विधाता,
क्या जग की अनुरक्ति यही है?

जीवन की अभिव्यक्ति यही है! 

छल-प्रपंच को करता जाता, 

अपनी झोली भरता जाता,
झूठे आँसू आखों में भर-
मानवता को हरता जाता,
हाँ कलियुग का व्यक्ति यही है?

जीवन की अभिव्यक्ति यही है!

14 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की सही अभिव्यक्ति तो यही है…………………आपने खूबसूरती से परिभाषित किया है……………………गज़ब का लेखन और चिन्तन्।

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  2. असरदार शब्दों से सुसज्जित कर बहुत सुंदर अभिव्यक्ति का रूप दिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. हाँ कलियुग का व्यक्ति यही है?
    जीवन की अभिव्यक्ति यही है!

    सुन्दर अभिव्यक्ति...!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. जीवन का गणित पढकर आ रहा हूं। यहां जीवन की अभिव्यक्ति पढा तो पता चला कि क्यों नहीं हल होता जीवन का गणित!

    उत्तर देंहटाएं
  5. शब्द कोई व्यापार नही है,
    तलवारों की धार नही है,
    सुन्दर रचना
    शब्द व्यापार नहीं पर व्यापारी तो इसका भी व्यापार करते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  6. मौजूदा हालात को बयां करती है आपकी रचना बेहद शानदार है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज की बदलती दुनिया का शब्द चित्रण...सुंदर रचना शास्त्री जी आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. आज के जीवन को बहुत सुंदरता से अभिव्यक्त किया है...

    उत्तर देंहटाएं
  9. 17.07.10 की चिट्ठा चर्चा में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

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