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बुधवार, 7 जुलाई 2010

"घनश्याम के तन में!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


बादलों का साज बजा नील गगन में।
थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।


बह रही पुरवाई आज आन-बान से,
जंगलों में नाच रहे मोर शान से,
मस्त हो रहे हैं जन्तु आज मिलन में।
थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।


जल की धार गा रहीं मल्हार आज हैं,
विरह को जगा रहीं फुहार आज हैं,
ज्वार प्यार का चढ़ा है आज बदन में।
थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।


भर गये हैं सारे आज ताल-तलैय्या,
बाँसुरी की तान सुनाते हैं कन्हैय्या,
सजनी का ध्यान लगा आज सजन में।
थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. इस भीगे भीगे मौसम में आपकी इस सुन्दर रचना ने गज़ब ढा दिया, मस्ती को और बढ़ा दिया

    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. मौसम के अनुकूल सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।

    सौन्दर्य की रेखा ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कुछ तो मौसम ही ऐसा ही कुछ कमाल आपकी रचना का है !
    बेहद उम्दा रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  5. भर गये हैं सारे आज ताल-तलैय्या,
    बाँसुरी की तान सुनाते हैं कन्हैय्या,
    सजनी का ध्यान लगा आज सजन में।
    थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में।।
    सुन्दर समसामयिक रचना बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. शास्त्रीजी
    प्रणाम !

    बहुत मनोरम गीत लिखा है , अति सुंदर !
    चित्त पर छा जाने वाला !
    हृदय में बस जाने वाला !
    एक एक बंध को क्या बांधा है , शास्त्रीजी !

    मैं तो गा गा ' कर आनन्द द्विगुणित कर रहा हूं ।
    थिरक रही दामिनी घनश्याम के तन में…

    कोटिशः आभार और नमन !!

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

    उत्तर देंहटाएं
  7. ाआज तो सचमुच दामिनी चमक रही है……………………बेहद उम्दा रचना…………बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जल की धार गा रहीं मल्हार आज हैं,
    विरह को जगा रहीं फुहार आज हैं,

    बहुत सुन्दर गीत....

    उत्तर देंहटाएं
  9. सजनी का ध्यान लगा आज सजन में

    क्या बात है चाचाजी

    आज तो आपने सौंदर्यबोध को जगा दिया

    आपकी भाषा पर तो कोई भी मर मिट सकता है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. शास्त्री जी में भी इसे गाकर आनंद ले रहा हूँ - बधाई तथा आभार

    उत्तर देंहटाएं

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